सहजयोग के माध्यम से जीवन में पूर्णता लाएं

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योग हमारे देश में एक प्राचीन जीवन विद्या रही है, लेकिन उसे आधुनिक काल में लोगों ने मात्र एक शारीरिक विधि के रूप में सीमित कर दिया है। वास्तव में योग केवल शारीरिक क्रिया नहीं है जिससे मनुष्य अच्छे स्वास्थ्य को प्राप्त करे, बल्कि एक ऐसा प्रयास भी है जिससे जीवन में शुभता और दिव्यता की प्राप्ति हो । लोग केवल शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक शान्ति की खोज करते हैं, लेकिन वह खोज भौतिक व्यवस्थाओं से जुड़ी रहती है। अगर भौतिक व्यवस्था ठीक है तो स्वास्थ्य और शान्ति के लिये अनुकूल है, और हम भौतिक स्तर पर ही अपने आप को प्रसन्न रखने का प्रयास करते हैं। लेकिन प्रसन्नता की प्राप्ति नहीं होती, बल्कि जीवन में संघर्ष ही रहते हैं। हमारे मनीषियों ने योग का आविष्कार मनुष्य के जीवन को पूर्णरूप से सुधारने के लिये किया था, केवल रोग को दूर करने के लिये नहीं। जीवन को पूर्णरूप
से सुधारने का मतलब होता है अपनी शारीरिक ऊर्जाओं को, प्राणों को संतुलित रखना, मन को व्यवस्थित रखना, मन के विकारों को अपने से दूर रखने का प्रयास करना।                                                  मानसिक विकार हैं क्या? काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य-ये छः चीजें मानसिक विकार हैं। जब शरीर रोगग्रस्त होता है तो हम चिकित्सक के पास चले जाते हैं और रोग को दूर करने के लिये दवाई मिल जाती है। मानसिक व्यथा होती है तो हम किसी मनोचिकित्सक के पास जाते हैं या फिर किसी साधु-महात्मा के पास जाते हैं इस कामना के साथ कि संभवतः हमें समाधान मिल जायेगा। बहुत स्थानों में समाधान मिलता है, बहुत जगहों में नहीं भी मिलता है, लेकिन जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण केवल शारीरिक और मानसिक सुख से जुड़ा रहता है। 
   कई आत्मसाक्षात्कारी संतों ने बताया है कि मनुष्य का जीवन केवल शरीर और मन के सुख तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य है पूर्णता को प्राप्त करना। ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते- हमारे जीवन की यात्रा जो पूर्ण से आरम्भ हुई है उसका अन्त भी पूर्णता में ही होना है। इसी पूर्णता सहजयोग के माध्यम से होती है, सहजयोग संस्थापिका परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी साधको को अपनी अमृतवाणी में बताती है कि, मानव अपनी क्रमागत उन्नति के साथ आगे तो बढ़ रहा है, पर उसका सरोकार उसके जीवन देने वाले उस परमात्मा से दूर गया। उसकी पूरी प्राथमिकता अपने खाना, परिवार प्रयोजन और उसकी आवश्यकता तक रह गयी है। परंतु अब वक्त बदल गया है। अब सभी को अपनी आत्मा की ओर देखना चाहिए जो पूर्ण रूप से सत्य है। इस सत्य के लिए, हमें अपना आत्मसाक्षात्कार लेना होगा, जो एक गुरु की उपस्थिति में ही पूर्ण होता है। इसलिए इस आत्मसाक्षात्कार को जानना भी मनुष्य की प्रवृत्ति में आना चाहिए । जो जीवन की समस्याओं का पूर्ण समाधान करता है। सहजयोग ध्यान द्वारा आत्मा को पाने की ऐसी पद्धति है जिसमें सहजता से निःशुल्क आत्मसाक्षात्कार प्राप्त होता है। अधिक जानकारी हेतु हमारे हेल्पलाइन नंबर 18002700800 पर संपर्क करें।

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