सहजयोग आज का महायोग : दीप सदैव दूसरों के लिए जलता है, न कि स्वयं के लिए
दीपक स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देता है। वह अपने अस्तित्व का उपयोग केवल अपने लिए नहीं करता, बल्कि आसपास के अंधकार को दूर करने के लिए करता है। यही भावना अध्यात्म का सार है, और सहजयोग में इसे अत्यंत गहराई से आत्मसात किया जाता है।
सहजयोग के अनुसार मनुष्य के भीतर एक दिव्य शक्ति — कुंडलिनी — विद्यमान है। जब यह शक्ति जागृत होती है, तब व्यक्ति केवल अपने सुख और स्वार्थ तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके भीतर प्रेम, करुणा और सेवा का भाव स्वतः प्रकट होने लगता है। जैसे दीपक का स्वभाव प्रकाश देना है, वैसे ही जागृत आत्मा का स्वभाव दूसरों के जीवन में शांति और आनंद फैलाना है।
श्री हनुमान इसका सर्वोत्तम उदाहरण हैं। उनके पास अपार शक्ति थी, पर उन्होंने कभी उसका उपयोग व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं किया। उनका जीवन पूर्णतः सेवा, समर्पण और धर्म के लिए समर्पित था। वे स्वयं तपते रहे, संघर्ष करते रहे, परंतु संसार को साहस, सुरक्षा और भक्ति का प्रकाश देते रहे। वे एक ऐसे दीपक हैं जिन्होंने न सिर्फ स्वयं को, बल्कि समस्त मानवता को प्रकाशित किया।
सहजयोग में भी साधक को यही शिक्षा दी जाती है कि आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करने के बाद उसका जीवन केवल व्यक्तिगत उपलब्धि तक सीमित न रहे। यदि ध्यान से हमें शांति मिलती है, तो उस शांति को दूसरों तक पहुँचाना भी हमारा कर्तव्य है। यदि हमारे भीतर प्रेम जागृत होता है, तो वह केवल अपने परिवार तक सीमित न होकर समाज तक फैलना चाहिए।
दीपक का प्रकाश तभी सार्थक है जब वह किसी और का अंधकार दूर करे। उसी प्रकार आध्यात्मिकता तभी पूर्ण मानी जाती है जब वह दूसरों के जीवन में आशा, संतुलन और आनंद उत्पन्न करे।
सहजयोग हमें सिखाता है कि:
अपने भीतर का दीप जलाओ,
अहंकार और अज्ञान का अंधकार मिटाओ,
और फिर उस प्रकाश को प्रेमपूर्वक संसार में बाँटो।
क्योंकि सच्चा संत वही है जो स्वयं प्रकाशित होकर दूसरों को भी प्रकाशित करे।
सहजयोग ध्यान पूर्णत: नि:शुल्क है। सहजयोग की अधिक जानकारी टोल फ्री नंबर 1800 2700 800 से प्राप्त कर सकते हैं।

