आत्म धर्म की अनुभूति सहजता से संभव

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धर्म आज समाज में बहुत हद तक दिखावा मात्र  रह गया है। इंसान धर्म की बातें तो करता है, उसके व्यवहार में धर्म नहीं दिखाई देता । धर्म के नाम पर लड़ता - झगड़ता है। आडंबरों में उलझा मनुष्य धर्म धारण नहीं कर पाता इसी कारण जन्म-मरण के बंधनों से मुक्त नहीं होता। 
        वास्तव में सहज होना ही धर्म है। अपनी आत्मा को पाना ही परमात्मा को पाना है। कलयुग की तपस्या अपने मन को और हृदय को शुद्ध बनाना है। आज हमारा मन ही सबसे ज्यादा अशुद्ध है। जो आत्मतत्व की ओर दृष्टि करने के बजाय भौतिक वादिता में रमा रहता है। हम दूसरों को को दोष देने में, शिकायतें करने में, हर जगह कमियां निकालने में, इंसान से ज्यादा चीजों को महत्व देने में अपना समय व्यर्थ गंवाते रहते हैं। इसका कारण अशुद्ध इच्छाएं हैं।  हमें प्रकृति से सीखना चाहिए  कि किस तरह वह निःस्वार्थ प्रेम करती है। हम उसे क्षतिग्रस्त करते रहते हैं, फिर भी वह हमें देती ही है बिना किसी अपेक्षा के। हमें भी उसी तरह अपने हृदय को शुद्ध बनाना चाहिये । इसका एक मात्र उपाय है, अपने हृदय को नि:स्वार्थ निर्वाज्य  प्रेम से भरना। इसके लिए हमें अपने गुरुतत्व की जागृति द्वारा सभी प्राणियों, सभी धर्मों, सभी मान्यताओं के शुद्ध तत्व को सम्मान देना होगा उन्हें आत्मसात् करना होगा।
     श्री माताजी ने अपनी अमृतवाणी में कहा है कि संन्यासी की कोई जात नहीं होती । संन्यासी का मतलब  है कि वह सर्व धर्म जाति को मानता है। यदि कोई भी धर्मगुरु स्वयं को किसी विशेष धर्म का कहता है तो समझ लेना चाहिए कि वह गुरु नहीं है। गुरु तत्व की पहली शक्ति है कि सर्व धर्म का जो निचोड़ है, उसकी जो निपुणता है, भोलापन है उसके अंदर भरा हुआ होता है।   
    अपने अंदर सच्चे व सहज धर्म की स्थापना करने हेतु  सहज ध्यान के माध्यम से चित्त व हृदय को दोष  मुक्त बनाएं । अपना आत्म साक्षात्कार लेकर अपनी शक्तियों को पहचानने हेतु अपने नज़दीकी सहजयोग केन्द्र पर संपर्क करें।  18002700800 पर कॉल करें तथा वेबसाइट  www.sahajyog.in से जानकारी प्राप्त करें।

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