एक कविता...

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अकेला चला वो मंजिल की ओर
 इस नदियाँ की गहराइयों से न डरा वो कभी, 
 लहरे भी कभी रास्ता रोकेगी उसे पता न था... 
नाव विशाल है सुद्रड़ है जिसमें वो बैठा है,
पर पतवार हाथ में न आयेगी उसे पता न था.... 
अकेला अनुकूल वातावरण बनाते चल पड़ा वो,
पर हवा,तूफाँ के भ्रम मे यूं थमेगी उसे पता न था... 
चल दिया मंजिल की ओर चाहे अंधेरे थे बहुत,
राह में कोई दिया न जलायेगा उसे पता न था... 
रुका नहीं खुद ही रास्ते साफ करते चला वो,  
पाने वाले,सुख पाकर काटें बिछायेंगे उसे पता न था.. 
हर कमी को दूर किया विजयी ध्वज फहराता चला,
 पर अब भी कारवाँ पुरा नहीं होगा उसे पता न था.,..


द्वारा-:विपिन जैन "श्रीजैन"
 इंदौर

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