सभी सृजनात्मक कार्य साक्षात् मां शारदा का ही आशीर्वाद हैं
'बसंत पंचमी विशेष'
सरस्वतीं च तां नौमि वागधिष्ठातृदेवताम्। देवत्वं प्रतिपद्यन्ते यदनुग्रहतो जना:॥
अर्थात--
वाणी की अधिष्ठात्री उन देवी सरस्वती को प्रणाम करता हूँ, जिनकी कृपा से मनुष्य देवता बन जाता है ।
बसंत पंचमी का भारतीय संस्कृति में अत्यधिक महत्व है। यह अवसर मां शारदे के प्राकट्य दिवस के रूप में विशेष महत्व रखता है। मां सरस्वती की आराधना उत्पादकता, सृजनात्मकता, कलात्मकता व बुद्धिमत्ता को प्रदान करने वाली होती है। समस्त प्रकार की विद्याएं व कलाएं मां के आशीर्वाद से ही प्राप्त होती हैं। कलाओं को ललित कला तथा उपयोगी कला में विभाजित किया गया है। संगीत, नृत्य, काव्य, चित्र, वास्तुकला आदि ललित कला के अन्तर्गत आते हैं जबकि कृषि, लुहार, सुनार, पाक-कला आदि उपयोगी कलाओं के रूप में जाने जाते हैं। प्राचीन भारत में इन कलाओं का विधिवत प्रशिक्षण दिया जाता था। हमारे ग्रंथों में चौंसठ सृजनात्मक कलाओं का उल्लेख है।
वर्तमान में भौतिकतावादी दृष्टिकोण के चलते कम उम्र से ही बच्चे एक अनावश्यक प्रतियोगिता का हिस्सा बना दिए जाते हैं। ऐसे में उनमें सृजनात्मक कलाओं के विकास की संभावनाएं बहुत कम हो जाती हैं। किसी भी विद्या या कला को पाने का आज का मुख्य उद्देश्य अधिकांशत: प्रसिद्धि अथवा धन की प्राप्ति ही होता है। यही कारण है कि न तो विद्या व न ही कला में व्यक्ति उत्कृष्टता को प्राप्त कर पाता है। इस संदर्भ में सहजयोग प्रणेता परम पूज्य श्री माताजी हमें दिग्दर्शित करती हैं कि,
यह सृजनशक्ति सरस्वती का आशीर्वाद है जिसके द्वारा अनेक कलाएं अत्पन्न हुई... कला की और दृष्टि बढ़ाने से एक तो जीवन में सौन्दर्य आ जाता है और जीवन का रहन-सहन सुन्दर हो जाता है... हमारे ऊबड़ खाबड़ जीवन में यदि थोड़ी सी कला की झलक आ जाए तो बड़ा सुख और आनंद मिलता है। परंतु अगर आप कला को बगैर आत्मसाक्षात्कार के ही अपनाना चाहें तो वह कला अधूरी रह जाती है ... अगर आत्मसाक्षात्कारी मनुष्य ... कोई कलात्मक चीज़ बनाता है तो उसमें से भी चैतन्य आने लग जाता है। सुन्दर होने के साथ साथ ऐसी कृति में एक तरह की अनन्त शक्ति होती है... क्योंकि उसने जो कुछ भी बनाया है आत्मा की अनुभूति से बनाया है। ... हाथ से बनी हुई चीज़ों में चैतन्य बहता है।... हाथ से बनी चीज़ों के द्वारा अपने हृदय का आनंद हम दूसरों को समर्पित करते हैं। ... कलात्मक चीज़ हठात् आपको निर्विचारिता में उतारेगी ... क्योंकि सौन्दर्य देखने से ही चैतन्य एक दम बहने लगता है।
कला का जो भी कार्य हम करते हैं वह परमात्मा को समर्पित होना चाहिए। इस भाव से की गई सभी रचनाएं शाश्वत होंगी। परमात्मा को समर्पित सभी कविताएं, संगीत और कलाकृतियां आज भी जीवित हैं।... कला परमात्मा की ज्योति है... इनमें चैतन्य लहरियां हैं।
इस बसंत पंचमी श्री माताजी के दिव्य आशीर्वाद की छत्रछाया को प्राप्त करने हेतु सहजयोग से संबंधित जानकारी निम्न साधनों से प्राप्त कर सकते हैं। यह पूर्णतया निशुल्क है। टोल फ्री नं – 1800 2700 800 अथवा यूट्यूब चैनल लर्निंग सहजयोगा से प्राप्त कर सकते हैं।

