एक कलाकार की पुकार और इंडस्ट्री का मौन
राजपाल यादव प्रकरण पर विशेष संपादकीय
संपादकीय – गोपाल गावंडे
बॉलीवुड की चकाचौंध भरी दुनिया में जब रोशनी होती है तो सब दिखाई देते हैं,
लेकिन जब अंधेरा आता है तो चेहरों की पहचान बदल जाती है।
आज चर्चा एक ऐसे अभिनेता की है जिसने वर्षों तक लोगों को हँसाया—
पर जब खुद पर संकट आया तो चारों ओर सन्नाटा पसर गया।
सपना, जोखिम और असफलता की कीमत
साल 2010 में राजपाल यादव ने निर्माता बनने का साहस किया। उनकी फिल्म अता पता लापता लगभग 11 करोड़ की लागत से बनी। इसके लिए उन्होंने एक निजी कंपनी से 5 करोड़ का ऋण लिया।
फिल्म बॉक्स ऑफिस पर असफल रही।
निवेश डूबा, कर्ज बढ़ा, और मामला अदालतों तक जा पहुँचा।
निचली अदालत से होते हुए केस दिल्ली उच्च न्यायालय पहुँचा। अदालत ने भुगतान की समयसीमा तय की, लेकिन आर्थिक कठिनाइयों के कारण वे शर्तें पूरी न हो सकीं।
आखिरकार आत्मसमर्पण का आदेश—और जेल।
यह केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं, एक कलाकार के टूटते आत्मविश्वास की कहानी है।
अदालत में कही गई वे पंक्तियाँ…
“मेरे पास पैसे नहीं हैं, साथ देने वाला कोई नहीं… जेल भेज दीजिए।”
यह शब्द केवल बयान नहीं, उस इंडस्ट्री के आईने हैं जहाँ संघर्ष के दिनों में साथ रहने वाले, सफलता के दौर में तस्वीरें खिंचवाने वाले—मुश्किल समय में मौन हो जाते हैं।
कौन आया साथ?
सबसे पहले बिहार के उद्योगपति राव इंद्रजीत यादव ने सहयोग की घोषणा की।
फिर अभिनेता सोनू सूद ने एक भविष्य प्रोजेक्ट के साइनिंग अमाउंट के रूप में मदद की पहल की।
मीडिया जगत से उपेंद्र राय ने भी सहयोग राशि घोषित की।
परंतु सवाल यह है —
क्या यह जिम्मेदारी केवल बाहरी समाज की है?
क्या फिल्म उद्योग, जो सैकड़ों करोड़ की कमाई करता है, अपने कलाकारों के लिए कोई संरचना नहीं बना सकता?
बॉलीवुड की चुप्पी — असंवेदनशीलता या डर?
हो सकता है कानूनी जटिलताएँ हों।
हो सकता है मामला व्यक्तिगत हो।
पर जब एक कलाकार अकेलेपन की बात करे, तो संवेदना तो दिखाई जा सकती है।
बॉलीवुड में अक्सर “फैमिली” शब्द का इस्तेमाल होता है।
लेकिन क्या यह परिवार केवल अवॉर्ड फंक्शन और प्रमोशन तक सीमित है?
जरूरी प्रश्न
क्या फिल्म इंडस्ट्री में कलाकारों के लिए “आपातकालीन सहायता कोष” नहीं होना चाहिए?
क्या असफलता को अपराध समझ लिया गया है?
क्या रिश्ते केवल सफलता तक ही सीमित हैं?
निष्कर्ष: इंसानियत की परीक्षा
राजपाल यादव का मामला केवल कर्ज का मामला नहीं है।
यह उस संवेदनशीलता की परीक्षा है, जो किसी भी समाज और उद्योग को महान बनाती है।
आज जरूरत है कि हम यह सोचें —
हँसाने वाले कलाकार के आँसू अगर हमें दिखाई नहीं देते,
तो कहीं न कहीं हमारी संवेदनाएं ही खो गई हैं।
ग्लैमर की दुनिया में भी इंसानियत जिंदा रहनी चाहिए।
और अगर एक कलाकार यह कहने को मजबूर हो जाए कि “कोई साथ नहीं है,”
तो यह सिर्फ उसकी नहीं, पूरे सिस्टम की हार है।

गोपाल गावंडे
मुख्य संपादक, रणजीत टाइम्स
(संपादकीय विशेष)

