महिला पत्रकारों पर हमला—लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ पत्रकारिता के लिए खतरे की घंटी

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पत्रकार खुशबू श्रीवास्तव
इंदौर। पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सत्य को उजागर करना और पीड़ितों की आवाज़ को ताकत देना होता है। लेकिन जब महिला पत्रकार, जो विशेष रूप से सामान्य महिलाओं, गरीब  की आवाज़ उठाती हैं, वे खुद डिजिटल हिंसा और डर का शिकार बनने लगें, तो यह केवल उनके पेशे के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज और लोकतंत्र की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए एक बड़ा खतरा है।
क्यों महिला पत्रकार बन रही हैं निशाना?
महिला पत्रकारों को निशाना बनाए जाने के पीछे गहरा सामाजिक और राजनीतिक उद्देश्य है, जो उन्हें सीमाओं में बंधे देखना चाहता है।
ये पत्रकार जब न्याय और असमानता जैसे मुद्दों पर स्टोरी करती हैं, तो यह सीधे उन ताकतों को चुनौती देती है जो महिलाओं को चुप और अधीनस्थ देखना चाहते हैं।

हमलावरों का मुख्य उद्देश्य महिला पत्रकारों को डराना ताकि वे संवेदनशील विषयों पर काम करना छोड़ दें।

रिपोर्ट के अनुसार, तीन-चौथाई महिला पत्रकारों को ऑनलाइन हिंसा का सामना करना पड़ा है, और हर चार में से एक को शारीरिक हमले या जान से मारने की धमकी मिलीती है।

डिजिटल प्लेटफॉर्म अब केवल ट्रोलिंग या गालियों का माध्यम नहीं रहा, बल्कि यह वास्तविक हिंसा की तैयारी का मैदान बन चुका है। 

AI के माध्यम से महिला पत्रकारों के फर्जी वीडियो या तस्वीरें बनाकर सोशल मीडिया पर फैलाई जाती हैं, जिससे उनका चरित्रहनन होता है।
* डॉक्सिंग (Doxing): उनकी निजी जानकारी (घर का पता, फ़ोन नंबर आदि) ऑनलाइन उजागर की जाती है, जिससे उनका और उनके परिवारों का असुरक्षित महसूस करना स्वाभाविक है।
* लैंगिक दुष्प्रचार: यह यौन हिंसा और अपमानजनक टिप्पणियों के रूप में होता है, जिसका उद्देश्य महिला पत्रकारों को मानसिक दबाव में लाना है।

विश्व प्रेस स्वतंत्रता सम्मेलन 2020 की स्नैपशॉट रिपोर्ट के अनुसार, 73% महिला पत्रकारों ने ऑनलाइन हिंसा का अनुभव किया, और चौंकाने वाली बात यह है कि 20% महिला पत्रकारों को ऑनलाइन धमकियों के परिणामस्वरूप असली जीवन में हिंसा झेलनी पड़ी।

सुरक्षा नीतियाँ: मीडिया संस्थानों को महिला पत्रकारों की सुरक्षा के लिए ठोस नीतियाँ बनानी चाहिए, जिसमें कानूनी मदद, मनोवैज्ञानिक परामर्श और सुरक्षा संबंधी प्रशिक्षण शामिल हों। 

मीडिया में महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना, सभी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अनिवार्य है। अगर महिला पत्रकारों को डराकर चुप करा दिया गया, तो यह केवल पत्रकारिता की नहीं, बल्कि लोकतंत्र की पराजय होगी। इन डिजिटल हमलावरों का डटकर सामना करना होगा, क्योंकि वे सवालों से डरते हैं, और इसीलिए चुप कराने की साजिश कर रहे हैं।

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