मर्यादा पुरुषोत्तम राम के जन्मोत्सव : बड़ी हर्ष की बात है कि आज भगवान राम का जन्म उत्सव है
राजेश धाकड़
अयोध्या नगरी उस दिन कुछ अलग ही लग रही थी। गलियों में सजावट, मंदिरों में दीपों की रोशनी और हर चेहरे पर एक अनोखी खुशी थी। कारण था—चैत्र मास की नवमी, वह पावन दिन जब भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था।
राजा दशरथ के महल में वर्षों से एक ही चिंता थी—संतान की। कई यज्ञ और प्रार्थनाओं के बाद आखिरकार वह शुभ घड़ी आई। महल में जैसे ही यह समाचार फैला कि रानी कौशल्या ने एक दिव्य बालक को जन्म दिया है, पूरा अयोध्या हर्ष से झूम उठा।
उस रात आकाश भी जैसे उत्सव मना रहा था। चाँद की रोशनी और सितारों की चमक कुछ ज्यादा ही उजली लग रही थी। महल के भीतर, माता कौशल्या अपने नवजात शिशु को देख रही थीं—उस बालक के चेहरे पर एक अद्भुत तेज था, मानो स्वयं धर्म और मर्यादा ने जन्म लिया हो।
गुरु वशिष्ठ ने जब बालक को देखा तो उन्होंने कहा, “यह कोई साधारण बालक नहीं, यह युगों-युगों तक मानवता को मार्ग दिखाने वाला होगा।” तभी से उसका नाम रखा गया—राम।
अयोध्या की गलियों में मिठाइयाँ बाँटी जाने लगीं, ढोल-नगाड़े बजने लगे और हर ओर “जय श्रीराम” के स्वर गूंज उठे। गरीब से लेकर अमीर तक, हर कोई इस खुशी में शामिल था। ऐसा लग रहा था जैसे पूरी प्रकृति इस दिव्य जन्म का स्वागत कर रही हो।
एक छोटी सी बालिका, जो महल के बाहर खड़ी थी, अपनी माँ से पूछ बैठी, “माँ, क्या ये राजकुमार सच में इतने खास हैं?” माँ मुस्कुराई और बोली, “हाँ बेटी, ये सिर्फ अयोध्या के राजकुमार नहीं, ये हर दिल के भगवान बनेंगे।”
समय बीतता गया, लेकिन उस दिन की खुशी और उल्लास कभी कम नहीं हुआ। हर वर्ष उसी दिन लोग रामनवमी के रूप में भगवान राम के जन्मोत्सव को मनाते हैं—सिर्फ एक जन्मदिन नहीं, बल्कि सत्य, धर्म और आदर्शों के जन्म का उत्सव।
और तभी से, हर बार जब रामनवमी आती है, अयोध्या की वो खुशियाँ, वो रोशनी और वो “जय श्रीराम” की गूंज फिर से जीवंत हो उठती है।

