दान, तप व आत्मिक उत्थान ही मकरसंक्रांति का मूल तत्व है

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 जब सूर्य धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करता है, तब मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता है।
हिंदू धर्म में वर्ष को दो अयनों में बांटा गया है: उत्‍तरायण और दक्षिणायण। मकर संक्रांति के दिन से सूर्य की उत्‍तरायण गति प्रारंभ हो जाती है इसलिए मकर संक्रांति को उत्‍तरायण भी कहते हैं। उत्‍तरायण को देवताओं का दिन अर्थात् सकारात्‍मकता का प्रतीक माना जाता है। इसीलिए इस दिन जप, तप, दान, स्‍नान,  आदि धार्मिक क्रियाकलापों को विशेष महत्‍व दिया जाता है।  संक्रांति के पर्व पर दान देने का विशेष महत्व बताया गया है। श्री माताजी ने दान दिए जाने की विषय में भी अपनी अमृतवाणी में उल्लेखित किया है ,
"दान किसे दिया जाए? ऐसा भी प्रश्न खड़ा होता है। यह देखना चाहिए कि हम मुक्त मन से अपने देश के लिए, अपने बंधुओं के लिए, अपने पड़ोसियों के लिए क्या कर रहे हैं? मन रोककर नहीं रखना चाहिए, मन खोलकर पूरी तरह से लुटाना चाहिए। उसका एक विशेष आनंद होता है। इस अवसर पर तिल व गुड़ को हमारी संस्कृति में विशेष महत्व दिया गया है जो कि स्वास्थ्य के लिए ऋतु चर्या के अनुकूल तथा मृदुलता व मिठास का प्रतीक है।
     मकर संक्रांति पर सूर्य पूजा का विशिष्ट महत्व है। यह संकेत होता है कि दाता को सूर्य के जैसे अपना भाव रखना चाहिए।श्री माताजी ने वर्णित किया है , "सूर्य के जैसे अपना स्वभाव होना चाहिए। सूर्य क्या करता है ,  इसका उसे कुछ आभास ही नहीं। उसे कुछ भी पता नहीं परंतु सतत् कर्मों में खड़ा है ,  सदैव प्रज्वलित रहता है |  आपको नित्य प्रकाश देकर, आनंद देकर, संपूर्ण जीवनत्व देकर आप का पालन पोषण करता है। हम प्रतिदिन उसे देखते हैं। बहुत लोग उसे नमस्कार भी करते हैं किंतु मात्र नमस्कार तक। उसमें से कुछ भी हमारे अंदर आता नहीं है | उसकी देने की शक्ति, उसकी क्षमता हमारे अंदर आनी चाहिए। " 
      श्री माताजी ने अनेक बार उपदेशित किया है कि सहजयोगी संत के समान है अतः उनका आचरण भी संत के समान होना चाहिए। उन्हें विश्व कल्याण के लिए प्रयासरत रहना चाहिए व उसके लिए उद्यम करना चाहिए। संक्रांति के पावन पर्व पर यह प्रण लेना चाहिए कि श्री माताजी की कृपा से व हमारे प्रयास से अनेकानेक लोग आत्मिक उत्थान को प्राप्त हो सकें तथा हम स्वयं भी अपने आत्मिक उत्थान को विकसित कर सकें | अपने अंदर सूर्य की शक्तियों को जागृत कर सकें तथा परमात्मा के कार्य में सहयोगी बनें। परमात्मा के कार्य का साधन होना अत्यंत गौरव की बात है और इस गौरव का आनंद आत्मसाक्षात्कार के पश्चात् ही प्राप्त किया जा सकता है। 
 निःशुल्क ध्यान प्रशिक्षण हेतु तथा अपने आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति हेतु जानकारी टोल फ्री नंबर  18002700800 अथवा यूट्यूब चैनल लर्निंग सहजयोगा से प्राप्त कर सकते हैं। सहज योग पूर्णतया निशुल्क है

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