दान, धर्म व आत्मज्ञान सहजयोग व भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर
भारतीय संस्कृति में दृढ़ विश्वास ही सहजयोग में आध्यात्मिक उन्नति का आधार है। परम पूज्य श्री माताजी ने सहजयोग की स्थापना के प्रारंभ से ही स्पष्ट रूप से निर्देशित किया है कि सहजयोग का मूल आधार सनातन भारतीय संस्कृति है। सहजयोग केवल आत्मसाक्षात्कार की साधना नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के शाश्वत मूल्यों को जीवन में आत्मसात करने का सशक्त माध्यम है। जो साधक भारतीय संस्कृति के प्रति श्रद्धा, सम्मान एवं दृढ़ विश्वास विकसित करता है, वही सहजयोग में वास्तविक आध्यात्मिक उत्क्रांति का अनुभव कर सकता है।
श्री माताजी ने साथ ही यह भी सावधान किया कि प्रत्येक सभ्यता की भाँति भारतीय समाज में भी समय के साथ धर्म के मूल स्वरूप में अनेक कुरीतियाँ, अंधविश्वास तथा बाह्य आडंबर सम्मिलित हो गए हैं। शुद्ध ज्ञान के अभाव में मनुष्य इन बाह्य परंपराओं को ही धर्म का वास्तविक स्वरूप मान बैठता है। किंतु कुंडलिनी जागरण के पश्चात प्राप्त आत्मसाक्षात्कार साधक को वह शुद्ध विवेक प्रदान करता है, जिससे वह धर्म के वास्तविक तत्व को सहज ही पहचान लेता है।
भारतीय संस्कृति के सर्वोच्च आदर्शों में दानधर्म का विशेष स्थान है। हमारे देश में दान केवल एक सामाजिक परंपरा नहीं, बल्कि जीवन का संस्कार है। प्रथम ग्रास गौमाता को अर्पित करने से लेकर अंतिम ग्रास श्वान को देने तक तथा समाज के आर्थिक एवं सामाजिक रूप से वंचित वर्गों को पर्व-त्योहारों पर प्रेमपूर्वक अन्न, वस्त्र एवं मिष्ठान प्रदान करने की परंपरा भारतीय जीवन-दर्शन की करुणा, संवेदना और समरसता का अद्भुत उदाहरण है।
भारतीय इतिहास राजा हरिश्चंद्र, राजा शिवि, महर्षि दधीचि तथा दानवीर कर्ण जैसे असंख्य महान विभूतियों के त्याग और दान से गौरवान्वित है। इसी प्रकार भारत के राजदरबार सदैव कलाकारों, विद्वानों, ऋषियों एवं ज्ञानपरंपरा के संरक्षकों के सम्मान और संरक्षण के केंद्र रहे हैं। यही हमारी संस्कृति की उदारता और लोककल्याणकारी दृष्टि का प्रमाण है।
श्री माताजी ने अपनी अमृतवाणी में धन के वास्तविक उद्देश्य का उल्लेख करते हुए कहा है— "आशीर्वाद के रूप में जो धन मनुष्य को प्राप्त होता है, वह उदारतापूर्वक सृजनात्मक कलाकारों, लेखकों, कवियों की कला के संरक्षण तथा जरूरतमंद लोगों की वास्तविक सहायता करके आनंद प्राप्त करने के लिए होता है।"( 'पराआधुनिक युग' पुस्तक से साभार)
इसी भाव को आगे बढ़ाते हुए 15 मार्च 1984 को दिल्ली में दिए गए अपने प्रवचन में श्री माताजी ने कहा—
"सोचना चाहिए, पैसा जो है परमात्मा ने हमारे लिए दान के लिए दिया है। हम बीच में केवल एक माध्यम बने खड़े हैं। इसका जो शुभ कर्म हो सकता है, वह करना है और इससे जितने लोगों की सहायता हो सकती है, वह करनी चाहिए तथा सदैव सन्मार्ग पर चलना चाहिए।"
सहजयोग की विशेषता केवल व्यक्तिगत आध्यात्मिक उन्नति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामूहिक चेतना और विश्वकल्याण का मार्ग भी है। सहजयोगी विश्व निर्मला धर्म का अभिन्न अंग तथा परमात्मा के कार्य का माध्यम हैं। अतः संपूर्ण विश्व हमारा कर्मक्षेत्र है और प्रत्येक साधक का दायित्व है कि वह उदारता, करुणा एवं प्रेम के साथ मानवता की सेवा के लिए सदैव तत्पर रहे।
नज़दीकी सहजयोग ध्यान केंद्र की जानकारी टोल फ्री नंबर 1800 2700 800 से अथवा वेबसाइट www.sahajayoga.org.in से प्राप्त कर सकते हैं।सहज योग पूर्णतया निशुल्क है

