गौशाला या मौत का घर? पिपलोदा में गौमाता की दुर्दशा पर जिम्मेदारों की चुप्पी सवालों के घेरे में
कागज़ों में सेवा, ज़मीन पर सज़ा! आखिर गौशाला का पैसा जा कहाँ रहा है?
सूर्या परमार शुजालपुर
शुजालपुर। ग्राम पंचायत पिपलोदा की गौशाला की जो तस्वीरें सामने आई हैं, वे सिर्फ एक गौशाला की बदहाली नहीं, बल्कि उन दावों पर भी करारा तमाचा हैं जिनमें गौसेवा की बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं।
गौशाला में चारों ओर गंदगी, कीचड़, गोबर का अंबार और बदहाल व्यवस्था साफ़ दिखाई दे रही है। सबसे दर्दनाक तस्वीर उस गाय की है, जिसकी मौके पर मौत हो चुकी थी। सवाल यह है कि आखिर यह मौत बीमारी से हुई, भूख से हुई, लापरवाही से हुई या जिम्मेदारों की संवेदनहीनता से?
जिस गौशाला को गौमाता के संरक्षण और सेवा का केंद्र होना चाहिए था, वहां की हालत देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो बेजुबान पशु किसी गौशाला में नहीं, बल्कि ऐसी कैद में जीवन काट रहे हों जहाँ न समय पर भोजन की गारंटी है और न ही समुचित देखभाल की। जेल में बंद कैदी को भी समय पर भोजन और स्वास्थ्य सुविधा मिल जाती है, लेकिन यहाँ गौमाता के हिस्से में क्या आया—गंदगी, बदहाली और अंत में मौत?
सबसे बड़ा सवाल ग्राम पंचायत के सरपंच और सचिव से है। क्या यही आपकी गौसेवा है? क्या सरकार से गौशाला संचालन के नाम पर मिलने वाली राशि वास्तव में गौमाता पर खर्च होती है, या फिर कागज़ों में खर्च दिखाकर लीपापोती कर दी जाती है? यदि रिकॉर्ड में सब कुछ व्यवस्थित है, तो धरातल पर इतनी भयावह स्थिति क्यों दिखाई दे रही है?
यह भी बड़ा प्रश्न है कि क्या गौशालाओं की निगरानी के लिए कोई समिति या जिम्मेदार अधिकारी है? यदि है, तो उसने आखिरी बार इस गौशाला का निरीक्षण कब किया? क्या निरीक्षण सिर्फ फाइलों तक सीमित है और वास्तविकता देखने की किसी को फुर्सत नहीं?
हर चुनाव में गौमाता के नाम पर राजनीति होती है, वोट मांगे जाते हैं और गौसंरक्षण के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं। लेकिन जब गौमाता की जान बचाने की बात आती है तो जिम्मेदारों की संवेदनाएं आखिर कहाँ चली जाती हैं?
अब देखना यह है कि ग्राम पंचायत पिपलोदा की इस गौशाला में सामने आई गंभीर अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच होगी या फिर यह मामला भी कुछ दिनों की चर्चा के बाद फाइलों में दफन कर दिया जाएगा। यदि समय रहते जवाबदेही तय नहीं हुई, तो गौसंरक्षण के दावे केवल भाषणों तक सीमित रह जाएंगे और बेजुबान गौमाताओं की मौत का सिलसिला यूँ ही चलता रहेगा।

