बुनियाद सुविधाएं देने में भी असफल है डीन मुथा: मेडिकल कॉलेज में दो वर्षों से जल संकट, छात्रों की आवाज़ दबाई जा रही!
डॉ. लक्ष्मीनारायण पांडेय शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय में पिछले दो वर्षों से व्याप्त जल संकट ने संस्थान की गंभीर प्रशासनिक विफलता को उजागर कर दिया है। कॉलेज के बॉयज़ हॉस्टल, गर्ल्स हॉस्टल, पीजी हॉस्टल तथा अकादमिक ब्लॉक—इनमें से किसी भी स्थान पर आज की तारीख में स्वच्छ पेयजल का एक भी भरोसेमंद स्रोत उपलब्ध नहीं है। 900 से अधिक एमबीबीएस छात्र, लगभग 100 स्नातकोत्तर छात्र तथा परिसर में निवास करने वाले रेज़िडेंट्स इस संकट से प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हैं।
छात्रों के अनुसार, कॉलेज परिसर में स्थापित वाटर कूलर पिछले दो वर्षों से अधिकांशतः गैर-कार्यशील हैं और पानी की आपूर्ति अत्यंत असंतोषजनक एवं अनियमित बनी हुई है। मजबूरी में बाहर से मंगवाया जा रहा पानी भी गुणवत्ता मानकों पर खरा नहीं उतरता। इसके बावजूद, बार-बार शिकायतें किए जाने और प्रशासन व डीन को अवगत कराने के बाद भी अब तक कोई स्थायी या ठोस समाधान नहीं किया गया। यह स्थिति डीन की स्पष्ट नाकामयाबी, लापरवाही और गैर-जिम्मेदार रवैये को दर्शाती है। यदि छात्र बाहर से लाया गया पानी पीने के कारण बीमार पड़ते हैं, तो इसकी नैतिक, प्रशासनिक और कानूनी ज़िम्मेदारी आखिर किसकी होगी—यह एक गंभीर प्रश्न है।
स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि छात्र अपनी बुनियादी आवश्यकताओं को लेकर भी खुलकर बोलने में असमर्थ हैं। डीन के विरुद्ध आवाज़ उठाने का भय इतना गहरा है कि छात्र प्रतिनिधित्व, संवाद और शिकायत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया लगभग दबा दी गई है। डर के इस माहौल में छात्रों के स्वास्थ्य और जीवन से जुड़े मुद्दे भी अनसुने किए जा रहे हैं।
जल संकट के साथ-साथ महाविद्यालय और संबद्ध अस्पताल की कैंटीन सेवाओं की स्थिति भी अत्यंत चिंताजनक और खतरनाक होती जा रही है। छात्रों और रेज़िडेंट्स के अनुसार, कॉलेज कैंटीन की गुणवत्ता जुलाई 2024 के बाद से लगातार गिरती चली गई है। भोजन की गुणवत्ता असंतोषजनक है और अनेक अस्वच्छ व असुरक्षित खाद्य प्रथाएँ सामने आ रही हैं। अत्यंत गंभीर तथ्य यह है कि कैंटीन के किचन के ठीक पास एक खुली सीवर लाइन बह रही है, जिसमें लगातार लीकेज हो रहा है। यह स्थान मक्खियों और गंदगी का केंद्र बन चुका है, जो संक्रामक रोगों को फैलाने का एक खुला निमंत्रण है। यह स्थिति किसी भी समय बड़े स्वास्थ्य संकट में बदल सकती है। इसके बावजूद, डीन और प्रशासन द्वारा कोई प्रभावी कार्रवाई न किया जाना उनकी गैर-जिम्मेदार निगरानी और प्रशासनिक उदासीनता को दर्शाता है।
विशेष चिंता का विषय यह भी है कि महाविद्यालय में अध्ययनरत अनेक छात्र ग्रामीण, आदिवासी एवं आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आते हैं, जो पहले से ही महँगी चिकित्सा शिक्षा, भोजन और पानी की बढ़ती लागत का बोझ उठा रहे हैं। ऐसे छात्रों को स्वच्छ पेयजल और सुरक्षित भोजन जैसी बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध न कराना न केवल प्रशासनिक विफलता है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और संस्थागत दायित्वों के भी पूर्णतः विपरीत है।

