इंदौर का आरईटी संरक्षण मॉडल: दुर्लभ वनस्पति प्रजातियों के पुनर्जीवन का एक अंतर-संस्थागत मॉडल

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आदित्य शर्मा

इंदौर। दुर्लभ, संकटग्रस्त एवं विलुप्तप्राय (RET) देशी वृक्ष प्रजातियों के संरक्षण हेतु इंदौर में शुरू की गई एक जिला-स्तरीय पहल अब अपने प्रारंभिक वन विभागीय दायरे से आगे बढ़कर विश्वविद्यालयों, पुलिस विभाग और पड़ोसी वन मंडलों तक विस्तारित हो रही है। यह मॉडल अब जैव विविधता आधारित पुनर्स्थापन (restoration) के लिए एक अनुकरणीय ढांचे के रूप में अपनाया जा रहा है।

इंदौर वन मंडल द्वारा विकसित यह आरईटी संरक्षण मॉडल देशी वृक्ष प्रजातियों में आई तीव्र गिरावट की प्रतिक्रिया के रूप में तैयार किया गया था। इस ढांचे ने पारंपरिक पौधारोपण अभियानों से आगे बढ़ते हुए वैज्ञानिक योजना, सामुदायिक सहभागिता और संस्थागत स्वामित्व को एकीकृत किया। जो प्रयास एक स्थानीय पर्यावरणीय चिंता से शुरू हुआ था, वह अब यह तय कर रहा है कि विभिन्न सार्वजनिक संस्थान देशी प्रजातियों के संरक्षण को कैसे अपनाते हैं।

शैक्षणिक अंगीकरण: विश्वविद्यालय की अग्रणी भूमिका

मॉडल के विस्तार में एक महत्वपूर्ण कदम देवी अहिल्या बाई विश्वविद्यालय, इंदौर द्वारा उठाया गया है, जिसने आरईटी संरक्षण को संस्थागत स्तर पर आगे बढ़ाने हेतु इंदौर वन मंडल को मार्गदर्शन के लिए आमंत्रित किया है।

विश्वविद्यालय परिसर में पहले से किए गए सफल आरईटी पौधारोपण के बाद, विश्वविद्यालय नेतृत्व ने वन विभाग के साथ औपचारिक समन्वय शुरू किया। इसका उद्देश्य बड़े पैमाने पर आरईटी पौधारोपण, छात्रों के लिए संरचित प्रशिक्षण तथा अकादमिक एकीकरण की संभावनाओं को विकसित करना है।

इस संदर्भ में दिनांक 10.12.2025 को विश्वविद्यालय परिसर में एक आधिकारिक समन्वय बैठक आयोजित की गई, जिसकी अध्यक्षता डॉ. राकेश सिंघई, कुलपति, देवी अहिल्या बाई होलकर विश्वविद्यालय, इंदौर ने की। बैठक में निम्न अधिकारी एवं विशेषज्ञ उपस्थित रहे—

डॉ. पी.सी. दुबे, सेवानिवृत्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक
श्री प्रदीप मिश्रा, वनमंडलाधिकारी, इंदौर वन मंडल
डॉ. संजय व्यास, प्रोफेसर, शासकीय होलकर साइंस कॉलेज, इंदौर
श्री धीरेंद्र प्रताप सिंह, एसडीओ, सामाजिक वानिकी, इंदौर

बैठक में यह स्पष्ट किया गया कि विश्वविद्यालय अब एक-दिवसीय पौधारोपण कार्यक्रमों से आगे बढ़ते हुए संरक्षण शिक्षा में दीर्घकालिक भूमिका निभाना चाहता है। इसमें छात्रों के लिए एक विशेष अकादमिक पाठ्यक्रम तैयार करने पर चर्चा हुई, जिसमें वन पारिस्थितिकी, पारिस्थितिक सेवाएँ, जैव विविधता संरक्षण तथा जलवायु अनुकूलन में आरईटी प्रजातियों की भूमिका शामिल होगी।

साथ ही, नर्सरी प्रशिक्षण, प्रजाति पहचान, पारिस्थितिक निगरानी और मार्गदर्शित वन भ्रमण जैसे फील्ड-आधारित घटकों की भी योजना बनाई जा रही है, ताकि छात्र संरक्षण कार्यों से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ सकें।

पुलिस विभाग की सहभागिता

एक अन्य उल्लेखनीय पहल के तहत मध्य प्रदेश पुलिस विभाग ने भी वन विभाग के साथ समन्वय में आरईटी आधारित पौधारोपण शुरू किया है, जो कानून प्रवर्तन और पर्यावरण संरक्षण के बीच एक दुर्लभ समन्वय को दर्शाता है।

15 दिसंबर 2025 को इंदौर के स्कीम-140 क्षेत्र तथा 16 दिसंबर 2025 को देवास जिले के शंकरगढ़ पहाड़ियों में आरईटी पौधारोपण कार्यक्रम आयोजित किए गए। ये कार्यक्रम श्री राजा बाबू सिंह, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (ADGP), मध्य प्रदेश पुलिस की उपस्थिति में सम्पन्न हुए।

पुलिस अधिकारियों के अनुसार, इस सहभागिता का उद्देश्य पर्यावरणीय जिम्मेदारी को बढ़ावा देना, संस्थागत परिसरों में हरित क्षेत्र विकसित करना और देशी प्रजातियों के संरक्षण का सामाजिक संदेश सुदृढ़ करना है।

अन्य जिलों में प्रतिकृति

इंदौर मॉडल से प्रेरित होकर देवास जिला अब विशेष रूप से आरईटी प्रजातियों के संरक्षण पर केंद्रित कार्यक्रम शुरू कर चुका है। वहीं उज्जैन और धार वन मंडलों ने भी नर्सरी योजना, प्रजाति-वार निगरानी और सामुदायिक बीज संग्रह जैसे घटकों को अपनाने में रुचि व्यक्त की है।

अधिकारियों का कहना है कि इस मॉडल की लचीलापन-आधारित संरचना इसे विभिन्न भौगोलिक एवं वन प्रकारों में अपनाने योग्य बनाती है।

संस्थाएँ इस मॉडल को क्यों अपना रही हैं

विशेषज्ञों के अनुसार, आरईटी प्रजातियाँ संख्या में कम होने के बावजूद भू-जल पुनर्भरण, मृदा संरक्षण, जैव विविधता समर्थन और दीर्घकालिक जलवायु स्थिरता में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ये गुण अक्सर सजावटी या तेज़ी से बढ़ने वाली प्रजातियों में अनुपस्थित होते हैं।

विश्वविद्यालयों, पुलिस परिसरों, सरकारी संस्थानों और समुदायों में आरईटी संरक्षण को समाहित कर यह मॉडल पौधारोपण को केवल एक वानिकी गतिविधि नहीं, बल्कि शासन और शिक्षा का विषय बनाता है।

संरक्षण सोच में बदलाव

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि इंदौर आरईटी मॉडल की विशिष्टता केवल प्रजाति चयन में नहीं, बल्कि इसके संस्थागत विस्तार में निहित है। विश्वविद्यालय इसे शिक्षा से जोड़ रहे हैं, पुलिस विभाग पारिस्थितिक उत्तरदायित्व निभा रहा है और अन्य वन मंडल इसे अपने परिदृश्य के अनुसार अपना रहे हैं।

मध्य भारत में बढ़ते जलवायु दबाव और जैव विविधता ह्रास के बीच, यह अंतर-संस्थागत अंगीकरण देशी प्रजातियों के दीर्घकालिक पुनर्जीवन के लिए एक अनुकरणीय और सतत मार्ग प्रस्तुत करता है।

प्रदीप मिश्रा, IFS
वनमंडलाधिकारी, इंदौर

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