समान नागरिक संहिता यूसीसी कानून मे पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं साबिर फ़िटवेल
रिपोर्टर :- सलीम हुसैन
झाबुआ। मध्य प्रदेश सरकार ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का मसौदा तैयार करने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है। समिति द्वारा यूसीसी के संबंध में विभिन्न धर्मों के लोगों से उनके सुझाव एवं आपत्तियाँ प् प्रत्येक जिलों से प्राप्त की जा रही है
प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता साबिर फिटवेल ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि समान नागरिक संहिता और पर्सनल लॉ में बहुत बड़ा अंतर है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 समान नागरिक संहिता की बात करता है ना कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप की।
संविधान के नीति निदेशक तत्वों का हवाला देकर मुस्लिम पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप करने का प्रयास किया जा रहा है। भारत में जितने भी ऐसे कानून बनाए जा सकते थे जो सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू हों वे पहले से ही बनाए जा चुके हैं और मुसलमान उन सभी कानूनों का पालन भी करता है। इस पर किसी को कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन पर्सनल लॉ एक अलग विषय है जो विभिन्न धर्मों के विवाह तलाक और उत्तराधिकार से संबंधित है। देश का कानून सभी धर्मों के लोगों को अपने धार्मिक मामलों के पालन की पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान करता है। विभिन्न धर्मों के पर्सनल लॉ संविधान से अलग कोई कानून नहीं हैं बल्कि वे भी संविधान के अंतर्गत ही आते हैं, जिसके अनुसार सभी लोगों को अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता प्राप्त है।
उन्होंने आगे कहा कि संविधान के नीति निदेशक तत्वों का हवाला देकर पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप करने की कोशिश की जा रही है जबकि इन्हीं नीति निदेशक तत्वों में अनेक अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर भी मार्गदर्शन दिया गया है जिनकी चर्चा कोई नहीं करता और न ही सरकार उन्हें लागू करना चाहती है। उदाहरण के लिए देश में पूर्ण शराबबंदी होनी चाहिए लेकिन आज प्रदेश में प्रतिदिन नई-नई शराब की दुकानें खोली जा रही हैं। इसी प्रकार नीति निदेशक तत्वों में समान कार्य के लिए समान वेतन आर्थिक समानता तथा भौतिक संसाधनों में समान अवसर जैसी बातों का भी उल्लेख है।
उन्होंने कहा कि समाज में न्यायपालिका के माध्यम से कुछ ऐसे नए निर्णय भी सामने आ रहे हैं जिन्हें भारतीय संस्कृति के अनुरूप नहीं माना जा सकता, जैसे लिव-इन रिलेशनशिप तथा पति-पत्नी के रहते हुए अवैध संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर किए जाने संबंधी निर्णय। ऐसे विषयों पर कोई चर्चा नहीं करता। हम विदेशी देशों की नकल करके ऐसे कानून लागू करना चाहते हैं, जिनसे स्वयं वे देश भी परेशान हैं और जिनके कारण वहाँ का सामाजिक ताना-बाना प्रभावित हुआ है। लिव-इन रिलेशनशिप जैसे प्रावधान कई देशों में तलाक के बाद संपत्ति के बंटवारे से बचने की प्रवृत्ति के कारण विकसित हुए हैं। जबकि हमारे देश में सभी धर्मों में वैध विवाह से स्थापित संबंधों को ही मान्यता प्राप्त है। इसलिए हमें विदेशी कानूनों की नकल करने के बजाय भारतीय संस्कृति परंपराओं और सामाजिक मूल्यों को ध्यान में रखना चाहिए।
उन्होंने कहा कि एक ओर पूरे देश में समान नागरिक संहिता की बात की जाती है लेकिन दूसरी ओर अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग कानून बनाए जा रहे हैं। पहले यह कानून गुजरात और उत्तराखंड में लागू किया गया और अब मध्य प्रदेश में भी इसे लागू करने की तैयारी की जा रही है। साथ ही इस कानून के दायरे से आदिवासी समाज के एक बड़े वर्ग को अलग रखा जा रहा है, जो समानता के मूल सिद्धांत के विपरीत है।
उन्होंने कहा कि अंग्रेजों के शासनकाल में भी विभिन्न धर्मों से संबंधित कानून उनके अनुयायियों से विचार-विमर्श और परामर्श के बाद बनाए जाते थे। समिति को भी राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक विचार-विमर्श और परामर्श करना चाहिए। साथ ही समिति को मुस्लिम पर्सनल लॉ का गहन अध्ययन करना चाहिए जिसमें अलग-अलग जिम्मेदारियों के अनुसार कानूनों का वर्गीकरण किया गया है। प्रत्येक व्यक्ति पर उसकी क्षमता के अनुसार दायित्व रखा गया है तथा कहीं कोई भेदभाव या असमानता नहीं है। इस्लाम में निकाह, तलाक और विरासत के बंटवारे का सुव्यवस्थित एवं न्यायपूर्ण तरीका बताया गया है। इसी तरह हलाला के विषय में जैसा खराब प्रचार किया जाता है ऐसी कोई खराब प्रथा की अवधारणा इस्लाम में मौजूद नहीं है।
उन्होंने यूसीसी समिति से मांग करते हुए कहा कि पर्सनल लॉ में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप न किया जाए। हमें अपने पर्सनल लॉ में किसी भी प्रकार की दखलंदाजी स्वीकार नहीं है और यह असहनीय है। सभी धर्मों के लोगों को अपने-अपने धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार जीवन जीने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।
वही शराबबंदी का कानून लागू किया जाए। साथ ही जिस प्रकार गाय को लेकर देशभर में विवाद उत्पन्न होते रहते हैं उसे देखते हुए पूरे देश में ऐसा कानून बनाया जाए जिसमें गाय की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध हो तथा बिक्री करने वाले के लिए कठोरतम दंड फांसी का प्रावधान किया जाए। इसके अतिरिक्त आपराधिक कानूनों में व्यभिचार (ज़िना) जैसे गंभीर अपराधों के संबंध में और अधिक कठोर कानूनी प्रावधान किए जाने की आवश्यकता है।

