200 करोड़ से अधिक की कथित वित्तीय गड़बड़ी में जांच तेज, सुप्रीम कोर्ट ने एफआईआर को चुनौती देने वाली याचिका खारिज

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ईओडब्ल्यू की एफआईआर बरकरार; ईडी की छापेमारी में 3.97 करोड़ नकद और करीब 3.45 करोड़ रुपये का सोना बरामद होने की जानकारी, ऑडिट रिपोर्ट में भी कई गंभीर सवाल
राजेश धाकड़ 
भोपाल/इंदौर। एलएनसीटी ग्रुप और उससे जुड़े जय नारायण चौकसे सहित अन्य के खिलाफ 200 करोड़ रुपये से अधिक की कथित वित्तीय अनियमितताओं के मामले में जांच का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (ईओडब्ल्यू) द्वारा दर्ज एफआईआर को चुनौती देने वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट द्वारा 19 अगस्त 2026 को खारिज किए जाने के बाद अब जांच एजेंसियों के लिए मामले की आगे की जांच का रास्ता और स्पष्ट हो गया है। मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) भी मनी लॉन्ड्रिंग के एंगल से जांच कर रहा है। ईडी ने जून में संबंधित परिसरों पर कार्रवाई करते हुए करीब 3.97 करोड़ रुपये नकद और लगभग 3.45 करोड़ रुपये मूल्य का सोना एवं आभूषण जब्त किए थे।

मामला श्री आस्था फाउंडेशन फॉर एजुकेशन सोसायटी से जुड़ा है। ईओडब्ल्यू की कार्रवाई के बाद सामने आई वित्तीय जांच और ऑडिट रिपोर्ट में सोसायटी की राशि के कथित तौर पर संबंधित ट्रस्टों, कंपनियों और अन्य संस्थाओं में ट्रांसफर किए जाने सहित कई लेन-देन पर सवाल उठाए गए हैं। ईडी के अनुसार सोसायटी द्वारा संचालित शैक्षणिक एवं स्वास्थ्य संस्थानों से संबंधित धनराशि के कथित डायवर्जन की भी जांच की जा रही है।

12 ठिकानों पर ईडी की कार्रवाई

मामले में 23 जून 2026 को ईडी ने धन शोधन निवारण कानून (पीएमएलए) के तहत संबंधित परिसरों पर एक साथ तलाशी कार्रवाई की थी। कार्रवाई के दौरान आवासीय परिसरों, कार्यालयों, शैक्षणिक संस्थानों, ट्रस्ट और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की तलाशी ली गई। जांच एजेंसी ने नकदी और सोने के अलावा वित्तीय दस्तावेज, संपत्ति से संबंधित कागजात, मोबाइल फोन, कंप्यूटर तथा अन्य डिजिटल उपकरणों और वित्तीय रिकॉर्ड को भी जांच के दायरे में लिया।

ऑडिट रिपोर्ट में लेन-देन पर उठे सवाल

मामले से संबंधित ऑडिट रिपोर्ट में करीब 21.90 करोड़ रुपये के लेन-देन को लेकर सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट में करीब 5.52 करोड़ रुपये के खर्च के समर्थन में जरूरी बिल या प्रमाण उपलब्ध नहीं होने का उल्लेख किया गया है। इसी तरह निर्माण कार्यों से जुड़े करीब 24.65 करोड़ रुपये के बिलों पर संबंधित अधिकारियों के हस्ताक्षर नहीं होने की बात भी सामने आई है।

ऑडिट में संबंधित संस्थाओं के बीच लेन-देन के कारण करीब 8.22 करोड़ रुपये के संभावित नुकसान का भी उल्लेख किया गया है। जांच एजेंसियां अब इन लेन-देन का मिलान बैंक खातों, लेखा पुस्तकों और ईडी की तलाशी के दौरान मिले दस्तावेजों से कर रही हैं।

छात्रों की फीस और बैंक ऋण की राशि की भी जांच

जांच का एक अहम बिंदु छात्रों से मिलने वाली फीस, छात्रवृत्ति की रकम और संस्थाओं के नाम पर लिए गए बैंक ऋण की राशि का इस्तेमाल है। एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि इन मदों में प्राप्त राशि वास्तव में संबंधित शैक्षणिक संस्थाओं पर खर्च हुई या फिर किसी अन्य संस्था, कंपनी अथवा ट्रस्ट में स्थानांतरित की गई।

मामले में उपलब्ध वित्तीय रिपोर्टों में यह भी सवाल उठाया गया है कि कुछ बैंक खातों में बड़ी मात्रा में रकम जमा होने और निकाले जाने का सिलसिला चलता रहा, जबकि कई महत्वपूर्ण लेन-देन के पीछे जरूरी दस्तावेज उपलब्ध नहीं थे।

8.22 करोड़ रुपये की फीस ट्रांसफर का भी उल्लेख

ऑडिट से संबंधित रिपोर्टों में बस और हॉस्टल फीस से जुड़ी करीब 8.22 करोड़ रुपये की राशि के ट्रांसफर पर भी सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार यह राशि संबंधित संस्था से जुड़ी कंपनी को हस्तांतरित की गई। जांच एजेंसियां यह भी देख रही हैं कि इस भुगतान के बदले वास्तव में कितनी सेवाएं दी गईं और संबंधित वित्तीय लेन-देन का संस्थागत उद्देश्य क्या था।

इसी तरह सोसायटी के नाम पर लिए गए बैंक ऋण की राशि के कथित तौर पर संबंधित ट्रस्ट या अन्य संस्थाओं की ओर जाने के मामलों की भी जांच की जा रही है। पूर्व में प्रकाशित रिपोर्टों में ऐसे कई लेन-देन का उल्लेख किया गया है।

पहले हाईकोर्ट, अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला

एफआईआर को चुनौती देने का मामला पहले मध्यप्रदेश हाईकोर्ट भी पहुंचा था। हाईकोर्ट ने अक्टूबर 2025 में एफआईआर निरस्त करने से इनकार करते हुए बड़े वित्तीय लेन-देन और ऑडिट रिपोर्ट में सामने आई अनियमितताओं को गंभीरता से लिया था। अदालत ने ऐसे बड़े आर्थिक मामले की विस्तृत जांच की आवश्यकता पर भी जोर दिया था।

इसके बाद एफआईआर को चुनौती देने की कोशिश सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची। अब 19 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा चुनौती वाली याचिका खारिज किए जाने के बाद जांच एजेंसियों के सामने वित्तीय लेन-देन की कड़ियों को जोड़ने का रास्ता खुला है।

संपत्तियों के लेन-देन पर भी न्यायिक निगरानी

इस मामले में आस्था फाउंडेशन की संपत्तियों को लेकर भी न्यायिक स्तर पर निगरानी रही है। फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने सोसायटी की संपत्तियों के हस्तांतरण पर रोक लगाते हुए स्थिति यथावत रखने का निर्देश दिया था। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पक्षकारों से जवाब भी मांगे थे।

अब जांच का सबसे बड़ा सवाल—पैसा आया कहां से और गया कहां?

मामले में जांच एजेंसियों के सामने सबसे अहम सवाल यही है कि 200 करोड़ रुपये से अधिक की कथित वित्तीय गड़बड़ी में पैसा किन स्रोतों से आया, किन खातों में गया और उसका अंतिम इस्तेमाल किस उद्देश्य से हुआ। इसके लिए बैंक रिकॉर्ड, लेखा पुस्तकों, ऑडिट रिपोर्ट, डिजिटल दस्तावेजों और ईडी की कार्रवाई के दौरान मिले रिकॉर्ड का मिलान किया जा रहा है।

ईडी ने भी अपनी जांच में संबंधित संस्थाओं से जुड़े धन के कथित डायवर्जन की बात कही है। एजेंसी के अनुसार छात्रवृत्ति और बैंक ऋण से जुड़ी राशि के संबंधित ट्रस्टों, कंपनियों तथा अन्य संस्थाओं में कथित स्थानांतरण की जांच की जा रही है।

जांच आगे बढ़ने के साथ बढ़ सकता है दायरा

ईओडब्ल्यू की एफआईआर और ईडी की पीएमएलए जांच के चलते अब यह मामला केवल एक संस्था के वित्तीय प्रबंधन तक सीमित नहीं रह गया है। जांच एजेंसियां संबंधित व्यक्तियों, संस्थाओं, ट्रस्टों, कंपनियों और बैंक खातों के बीच हुए लेन-देन की पूरी श्रृंखला खंगाल रही हैं। आने वाले समय में दस्तावेजी साक्ष्यों और वित्तीय रिकॉर्ड के आधार पर जांच का दायरा और बढ़ने की संभावना है।

हालांकि, मामले में लगाए गए वित्तीय अनियमितताओं के आरोप अभी जांच के विषय हैं और अंतिम दोषसिद्धि सक्षम न्यायालय के निर्णय पर निर्भर करेगी।

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