प्रकृति से जुड़कर ब्रम्हांड की सृष्टि का उद्देश्य पूर्ण करना मानव धर्म
प्रकृति से मानव की एकाकारिता कराता है सहज योग
मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम्।
संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत।।14.3
गीता के इस अध्याय में श्री कृष्ण अर्जुन को सम्बोधित करते हुए भारत कहते हैं। भा माने आभा, प्रकाश, ज्ञान। हमारे देश का नाम भारत दुष्यन्त और शकुन्तला के पुत्र भरत के नाम से पड़ा है और भारत के रत का अर्थ है रमण करने वाला ऐसा वह देश जहाँ पर ऋषि-मुनियों ने अपनी तपस्या से बहुत सारी तरङ्गे जो परमात्मा से प्राप्त किया और वेदों में, उपनिषदों में एवं बाकी सभी ग्रन्थों में, उन्होंने वह ज्ञान हमारे लिए प्रस्फुटित कर दिया। इसीलिए भगवान कहते हैं कि तुममें अभी भी उस ज्ञान की इच्छा बह रही है इसलिए तुम्हें मैं यह ज्ञान बताना चाहता हूँ, जो ज्ञान तुम्हारे जीवन में आने के बाद, उसका मनन करने के बाद तुम महात्मा का साधर्म्य प्राप्त कर लोगे। तुम्हारे अज्ञान के बादल हट जायेंगे।
जड़ और चेतन के सहयोग से ही सृष्टि का सारा कार्य चलता है। हमारे दो रूप हैं, एक स्थूल है जो हमें दिखता है और एक सूक्ष्म जो अन्दर है, चेतन के रूप में। जैसे पंखा है, उसका बाह्य रूप है ढाँचा किन्तु उसके अन्दर यदि विद्युत प्रभावित नहीं होती तो पंखा संचालित नहीं होगा और दूसरा यदि विद्युत वहाँ तक आ गई किन्तु पंखा नहीं है तो भी कार्य नहीं होगा क्योंकि दोनों के मिलाप से कार्य चलता है।
उसी प्रकार जड़ और चेतन के मिलाप से इस सम्पूर्ण सृष्टि का कार्य चलता है जिसे स्वयं का ज्ञान नहीं अन्य का भी नहीं तो चैतन्य प्रभावी कैसे होगा लेकिन जिसे स्वयं का ज्ञान है, चेतन का भी ज्ञान है, वह संसार के उत्थान हेतु कार्य कर सकता है। भगवान कहते हैं यह सृष्टि प्रकृति व पुरुष के सहयोग से संचालित होती है। यह महद्ब्रह्म मेरी प्रकृति है और इससे जुड़कर मेरे ब्रम्हांड की सृष्टि का उद्देश्य पूर्ण करना मानव धर्म।
सहज योग के माध्यम से यह एकाकारिता आसानी से हो जाती है। क्योंकि यहाँ चैतन्य का सुंदर प्रवाह हम महसूस कर सकते हैं। परम पूज्य श्री माताजी के अवतरण का उद्देश्य ही मानव को सहजता से इस गहन ध्यान से जोडना है ताकि सृष्टि का उद्देश्य पूरा हो सके। इस संदर्भ में परमपूज्य श्री माताजी के 21 जनवरी 1975 के इस प्रवचन को भी समझते हैं व आत्मसात करते हैं,
"ये जो आपके हाथों से चैतन्य लहरियां बह रही हैं, ये वही सुगंध है जिसके सहारे सारा संसार, सारी सृष्टि, सारी प्रकृति चल रही है" लेकिन आज आप वो चुने हुए फूल हैं, जो युगों से चुने गए हैं कि आज आप खिलेंगे और आपके अंदर से ये सुगंध संसार में फैल करके इस कीचड़ को, इस माया सागर की सारी गंदगी को खत्म कर देंगे। सहजयोग में आने के बाद मनुष्य सहज में ही उस उच्च स्थिति को प्राप्त कर सकता है जिसके लिए बड़े बड़े तपस्वियों को हजारों जन्म लेने पड़ते हैं। '"
सहज योग पूर्णतया निशुल्क है। आत्मसाक्षात्कार को प्राप्त करने हेतु अपने नज़दीकी सहजयोग ध्यान केंद्र की जानकारी टोल फ्री नंबर 1800 2700 800 से अथवा यूट्यूब चैनल लर्निंग सहजयोगा से प्राप्त कर सकते हैं।

