कमलिया फाटक पर ट्रेन की चपेट में आईं कई गायें, आखिर कब जागेगा शुजालपुर?
सूर्या परमार, शुजालपुर
गाय दूध दे तो माता, चुनाव आए तो गौमाता... लेकिन रेलवे ट्रैक पर बेसहारा हो तो किसकी जिम्मेदारी?
शुजालपुर के कमलिया फाटक के पास करीब 8 से 10 गायों के ट्रेन की चपेट में आने की दुखद सूचना सामने आई है। घटना ने एक बार फिर बेसहारा मवेशियों और गौशाला व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
शुजालपुर और आसपास गौशालाओं के नाम पर व्यवस्थाओं और राशि का प्रावधान होने के बावजूद अगर गायें सड़कों और रेलवे ट्रैक पर भटकती नजर आएं, तो सवाल उठना लाजिमी है कि व्यवस्था आखिर कागजों में है या जमीन पर?
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी है कि कुछ जगहों पर कागजों में पशुओं की संख्या ज्यादा और जमीन पर कम दिखाई देती है। अगर ऐसा है तो इसकी जांच क्यों नहीं होनी चाहिए?
दूसरी ओर सवाल उन पशुपालकों से भी है जो सुबह-शाम दूध निकालकर गायों को खुला छोड़ देते हैं। दूध घर पहुंच गया, लेकिन गाय सड़क पर जाएगी या रेलवे ट्रैक पर—इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
क्या गौसेवा का मतलब सिर्फ दूध निकालना और गौमाता का नाम लेना रह गया है?
एक तरफ गौशालाओं के दावे, दूसरी तरफ रेलवे ट्रैक पर दम तोड़ती गायें।
तो सवाल सीधा है—
क्या शुजालपुर की गायें भी अब राम भरोसे हैं?
प्रशासन बताए—इन बेजुबानों को सुरक्षित स्थान कब मिलेगा और ऐसी घटनाएं रोकने के लिए जिम्मेदारी आखिर तय किसकी होगी?

