"अब हो जा सहज"

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यह दुनिया सरोवर है,सरिता है,सागर है,
तेरा वजूद क्या,केवल छलकती गागर है,
ये धरती,नदी,आसमान सभी है मेजमान,
कुछ नहीं इनमें तेरा,तु इनका है मेहमान,
फिर क्यों?इतराये करे तु इतना अभिमानI

दूसरे की वस्तु के लिये,होता हमेशा झगड़ा, 
जो मिला उसमें हो संतोष,फिर क्या लफड़ा
जो तेरा है वह तेरा है,तुझको तो मिलेगा न,
जो तेरा नहीं है तो नहीं,क्यों होता परेशान, 
और क्यों! इतराये करे तु इतना अभिमानl

खुद के अंदर तो देखने की फुर्सत ही नहीं,
और तु चाँद सितारे छूने की बात करता हैं,
सम्मान करता नहीं,तु अपने माता पिता का, 
और तु रखे सारी दुनिया जितने का अरमान,
अरे क्यों? इतराये करे तु इतना अभिमानl

हर पल उम्र की सीढ़ी चढ़ता ही जा रहा है,
फिर भी स्पर्धा एवं इर्ष्या है तेरे मन मे बसी,
छूटे ना समय,पता नहीं कल कहाँ सवेरा है,
बढ़ाये चल कदम,है जब तक तेरे अंदर जान, 
न तु इतराना,नहीं कभी भी करना अभिमान l

 


विपिन जैन "श्रीजैन"
218, श्री मंगल नगर बंगाली चौराहा

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