पर्यावरण संरक्षण: विकास और हमारी जिम्मेदारी
संपादक: गोपाल गावंडे, रणजीत टाइम्स
आज जब भारत विकास के नए आयाम गढ़ रहा है, पर्यावरण संरक्षण की अनदेखी हमें चेतावनी दे रही है। प्रगति के इस दौर में जहां उद्योग, बुनियादी ढांचे और शहरीकरण का विस्तार हो रहा है, वहीं पर्यावरणीय चुनौतियां जैसे जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, और जैव विविधता का नुकसान गंभीर चिंता का विषय बन चुके हैं।
चुनौतियां और उनके प्रभाव
1. प्रदूषण का बढ़ता संकट: हमारे शहरों की हवा सांस लेने लायक नहीं रह गई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, भारत के कई शहर दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में गिने जाते हैं।
2. जल संकट: भूमिगत जल का तेजी से घटता स्तर और जल स्रोतों का दूषित होना हमारी कृषि, स्वास्थ्य और आजीविका पर गहरा प्रभाव डाल रहा है।
3. वृक्षों की कटाई: शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के कारण जंगलों का तेजी से विनाश हो रहा है, जिससे प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है।
सरकार की योजनाएं और जनभागीदारी
सरकार द्वारा ‘जल शक्ति अभियान’, ‘सिंगल यूज प्लास्टिक बैन’, और ‘हर घर तिरंगा’ जैसे अभियान शुरू किए गए हैं, लेकिन इनका प्रभाव तभी दिखेगा जब जनता सक्रिय रूप से भाग ले।
प्रमुख उपाय:
हर घर और स्कूल में जल संचयन अनिवार्य हो।
स्थानीय स्तर पर वृक्षारोपण और उनके संरक्षण के लिए अभियान चलाए जाएं।
ग्रीन ऊर्जा का उपयोग बढ़ाकर कार्बन उत्सर्जन को कम किया जाए।
स्थानीय उदाहरण और प्रेरणा
मध्य प्रदेश का ओंकारेश्वर और खंडवा रोड इस दिशा में प्रेरणा का काम कर रहे हैं। यहां अक्षय ऊर्जा परियोजनाएं और पर्यटन का विकास क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देते हुए पर्यावरण संरक्षण का उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं।
निष्कर्ष
यह समय है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाया जाए। सरकार, समाज और हर नागरिक की भूमिका इसमें समान रूप से महत्वपूर्ण है। यदि हम अपने कर्तव्यों को नहीं समझे, तो अगली पीढ़ी के लिए केवल प्रदूषण, जल संकट, और बीमारियां छोड़ जाएंगे।
“प्रकृति हमारी पूंजी है। इसे बचाना हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। चलिए, मिलकर इसे बचाने का संकल्प लें।”
आपका,
गोपाल गावंडे
संपादक, रणजीत टाइम्स