व्यक्ति में यह  विवेक होना चाहिए कि वह एक  शाश्वत अस्तित्व है : श्री माताजी

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सहजयोग संस्थापिका श्री माताजी निर्मला देवी जी ने कुंडलिनी जागरण द्वारा मानव के समक्ष आत्मा व  परमात्मा के एकीकरण का मार्ग प्रशस्त किया। यह मार्ग सभी के लिए है बस आवश्यकता है बिना किसी पूर्वाग्रह व वाद - विवाद के इसका अनुभव प्राप्त करने की। सत्य यह कि हम सभी स्वयं को मात्र एक देह मानकर चलते हैं । हमारा संपूर्ण जीवन इस देह की संतुष्टि में ही प्रयासरत रहता है। हम ये जानने का प्रयास भी नहीं करते कि जब देह नहीं होगी तब हम क्या होंगे ? श्री माताजी ने अपनी अमृतवाणी में इसकी व्याख्या इस प्रकार की है कि,
"व्यक्ति को जीवन के बारे में अत्यंत विवेकशील और सूझबूझ वाला दृष्टिकोण रखना होगा, यह कि आप स्वंय शाश्वत जीवन हैं, यह कि आप स्वंय शाश्वत अस्तित्व हैं, और यह कि आप इस धरती पर परमात्मा के बनाए आशीर्वादों का आनंद लेने के लिए आए हैं, न कि रोने-धोने के लिए, चिल्लाने के लिए, और दोषी महसूस करने के लिए। यह आपका काम नहीं है। पहली चीज़ यह है कि यही विवेकशीलता है कि आपको छोटी-छोटी तुच्छ चीज़ों के लिए दुखी नहीं होना है....... यहाँ आपके लिए आनंद बिखरा हुआ है। (24 अप्रैल 1980)
    अपने आप में आप एक अभिनव कंप्यूटर हैं और आपको केवल मुख्य स्त्रोत से जुड़ना है। लेकिन यह संदेश मिलने के बाद भी, वे इससे जुड़ना नहीं चाहते.... मगर यही एक चीज है जिसके लिए आप इस दुनिया में आये हैं। आप विकास प्रक्रिया मे एक अमीबा से इस अवस्था तक पहुँचे है।....एक माँ के स्वरूप में, मैं आपसे कहती हूँ कि यही आपका राज्याभिषेक है। आपके पिता स्वयं सारी शक्तियाँ प्रवाहित करने के लिए व्याकुल हैं, जो वास्तव में सर्वशक्तिमान हैं। वह चाहते है कि आप परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करें और आप इसे प्राप्त करें क्योंकि इसे प्राप्त करना आपका अधिकार है। (30.04.1980)
सहजयोग में मां के आशीर्वाद से परमात्मा की अनेक शक्तियों से साक्षात् करने का अनुभव आप प्राप्त करते हैं। बस इसके लिए एक ही योग्यता की आवश्यकता है शुद्ध इच्छा व निर्मल मन।
नज़दीकी सहजयोग ध्यान केंद्र की जानकारी टोल फ्री नंबर 1800 2700 800 अथवा यूट्यूब चैनल लर्निंग सहजयोगा से प्राप्त कर सकते हैं।

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