एक राष्ट्र, एक चुनाव : लोकतंत्र को नई दिशा देने की ऐतिहासिक पहल

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रिपोर्ट : _सूर्या परमार

भारत में चुनावों का सिलसिला कभी थमता नहीं — कभी लोकसभा, कभी विधानसभा, तो कभी पंचायत चुनाव। लगातार चुनावी प्रक्रिया से न केवल प्रशासनिक कार्य प्रभावित होते हैं बल्कि सरकारी खजाने पर भी बड़ा बोझ पड़ता है। इसी व्यवस्था में सुधार के लिए केंद्र सरकार “एक राष्ट्र, एक चुनाव” की ऐतिहासिक पहल कर रही है।

क्या है यह योजना
इस अवधारणा के तहत लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाएंगे, ताकि मतदान और परिणाम एक ही समय पर घोषित हों। इससे प्रक्रिया पारदर्शी, किफायती और समयबद्ध बनेगी।

इतिहास और लाभ
1951 से 1967 तक देश में एक साथ चुनाव हुए थे, पर बाद में यह क्रम टूट गया। विशेषज्ञों का मानना है कि एक साथ चुनाव से सरकार का समय और धन दोनों बचेंगे, प्रशासनिक दबाव घटेगा और विकास कार्यों में रुकावट नहीं आएगी।

चुनौतियाँ भी हैं
राज्यों और केंद्र की अवधि अलग-अलग होने के कारण संवैधानिक संशोधन आवश्यक होंगे। राजनीतिक सहमति बनाना भी एक बड़ी चुनौती है।

सरकार की तैयारी
केंद्र ने इस विषय पर पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में समिति गठित की है, जो सुझाव लेकर ठोस रिपोर्ट तैयार कर रही है।

जिला संयोजक Adv. धर्मेन्द्र परमार (SFONOE) का कहना है कि —

“एक राष्ट्र, एक चुनाव लोकतंत्र को नई दिशा देने वाला कदम है। इससे देश में पारदर्शिता और स्थिरता दोनों बढ़ेंगी।”

 

पत्रकार सूर्या परमार का मत है-

“यह पहल तभी सफल होगी जब इसमें सभी दलों और जनता की सहमति शामिल हो। राष्ट्रहित सर्वोपरि रखकर यह प्रणाली लागू की गई तो भारत का लोकतंत्र और मजबूत बनेगा।”

 

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