इंदौर की सड़कों पर सियासत की पत्थरबाजी… सवालों के घेरे में आंदोलन की संस्कृति, ''ये कश्मीर नहीं… इंदौर है..!
राजेश धाकड़
इंदौर… वो शहर जिसे कभी शांति, समझदारी और सभ्य राजनीतिक परंपराओं के लिए जाना जाता था। जहां आंदोलनों की आवाज़ में तीखापन जरूर होता था, लेकिन पत्थर नहीं उड़ते थे… जहां नारे लगते थे, लेकिन खून नहीं बहता था।
एक समय था जब आटा, शक्कर, दाल जैसी रोजमर्रा की वस्तुओं के दामों में चवन्नी भर बढ़ोतरी भी नेताओं को सड़क पर ले आती थी। धरना होता था, ज्ञापन दिया जाता था, सरकारों को कविताओं और व्यंग्यों से घेरा जाता था। पुलिस भी निश्चिंत रहती थी कि ये प्रदर्शन लोकतांत्रिक मर्यादा में रहेंगे।
लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है।
महंगाई रोज़ नया रिकॉर्ड बना रही है, मगर सड़कों पर सन्नाटा है। जनता जैसे हालातों की आदी हो चुकी है। और जब आंदोलन होते भी हैं तो वे जनहित से ज्यादा शक्ति प्रदर्शन का मंच बन जाते हैं। पहले से तय हो जाता है कि किसे कितना राजनीतिक लाभ लेना है, किसकी छवि बिगाड़नी है और किसकी चमकानी है।
शनिवार को प्रदर्शन के नाम पर हुई पत्थरबाजी ने इंदौर की छवि पर दाग लगा दिया। खून बहा… और सोशल मीडिया पर तंज गूंजा—
“यह इंदौर है… कश्मीर नहीं…”
सवाल सिर्फ पत्थरों का नहीं है… सवाल उस मानसिकता का है जो असहमति को हिंसा में बदल देती है।
इंदौर वही शहर है जिसने देश को कई दिग्गज नेता और पत्रकार दिए। जिसे कभी ‘पत्रकारिता की पाठशाला’ कहा गया। आर्थिक समृद्धि, स्वच्छता और सामाजिक समरसता में उदाहरण पेश करने वाला शहर आज खुद से सवाल पूछ रहा है— आखिर हमें क्या हो गया है?
बावड़ी हादसे में एक साथ कई जानें चली जाती हैं…
अस्पतालों में लापरवाही की खबरें आती हैं…
कभी नवजातों की सुरक्षा पर सवाल उठते हैं…
कभी पानी तक जानलेवा साबित होता है…
लेकिन सियासत का केंद्र बिंदु सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप बनकर रह जाता है।
अब आगे क्या होगा?
भाजपा और कांग्रेस एक-दूसरे पर उंगली उठाएंगे।
ये उनके “गुंडे” गिनाएंगे, वो इनके।
कुछ दिनों तक बयानों की पत्थरबाजी चलेगी।
राजनीतिक विश्लेषक यह गणित लगाएंगे कि किसे कितना फायदा हुआ और किसे नुकसान।
लेकिन असली नुकसान किसका हुआ?
इंदौर की उस पहचान का… जो संयम और संस्कार से बनती है।

