सहजयोग में प्राण प्रतिष्ठा का अर्थ है हमारे भीतर की यात्रा
प्राण प्रतिष्ठा का सामान्य अर्थ किसी मूर्ति या मंदिर में दिव्य शक्ति का आह्वान माना जाता है, लेकिन सहजयोग में इसका अर्थ इससे कहीं अधिक गहरा है। यहाँ प्राण प्रतिष्ठा का मतलब है, हमारे भीतर स्थित दिव्य चेतना का जागरण।
सहजयोग के अनुसार प्रत्येक मनुष्य के भीतर कुण्डलिनी शक्ति सुप्त अवस्था में विद्यमान रहती है। जब यह शक्ति जागृत होकर सहस्रार तक पहुँचती है, तब व्यक्ति आत्मसाक्षात्कार का अनुभव करता है। यही वास्तविक प्राण प्रतिष्ठा है बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक स्थापना।
सहजयोग हमें सिखाता है कि मनुष्य का शरीर स्वयं एक मंदिर है। जब हमारे भीतर शांति, संतुलन, करुणा और प्रेम जागृत होते हैं, तब जीवन सच में प्रकाशित होने लगता है। केवल बाहरी पूजा या कर्मकांड पर्याप्त नहीं, भीतर की चेतना का जागना भी आवश्यक है।
ध्यान और आत्मचिंतन के माध्यम से व्यक्ति धीरे-धीरे तनाव, भय और नकारात्मकता से मुक्त होने लगता है। उसके भीतर मौन और आनंद का अनुभव जन्म लेता है। यही भीतर की यात्रा मनुष्य को अपने वास्तविक स्वरूप के करीब ले जाती है।
इस प्रकार सहजयोग में प्राण प्रतिष्ठा का अर्थ है अपने भीतर परम चेतना को अनुभव करना और जीवन को आध्यात्मिक जागरूकता से भर देना। सहजयोग में प्राण प्रतिष्ठा किसी बाहरी कर्मकांड का अंत नहीं, बल्कि भीतर की यात्रा की शुरुआत है। यह वह क्षण है जब मनुष्य स्वयं को केवल शरीर और मन तक सीमित नहीं मानता, बल्कि अपने भीतर स्थित दिव्य चेतना को पहचानता है। जब भीतर का दीपक जलता है, तभी जीवन में वास्तविक प्रकाश आता है और शायद यही प्राण प्रतिष्ठा का सबसे गहरा अर्थ है ।
अपने भीतर परम चेतना को जागृत कर जीवन को सचमुच जीवंत बनाने हेतु सहजयोग की अधिक जानकारी टोल फ्री नंबर 1800 2700 800 अथवा www.sahajayoga.org.in से प्राप्त कर सकते हैं। सहजयोग पूर्णतया निःशुल्क है

