'मैं'... के अहंकार से 'तू' या 'हम' की समन्वयता तक की सहज यात्रा है सहज योग

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"मैं" का अहंकार "मैं" की भावना का इस भौतिक संसार से एक कोई रिश्ता नहीं क्योंकि मैं का यह अहंकार सिर्फ एक भ्रम है, यह यथार्थ नहीं है।  पर इससे पीछा छुड़ाना आसान नहीं है। हम स्वयं 'मैं'  से ऐसे जुड़ जाते हैं कि 'मैं' का मोह हमें एक झूठी खुशी से सराबोर करता रहता है और हम भ्रमलोक में जीने को विवश हो जाते हैं।  यह भ्रमजाल तब  उत्पन्न होता है जब हम अपने आप को शरीर, मन और इंद्रियों के साथ जोड़ लेते हैं और "मैं" और "मेरा" की भावना से ग्रस्त हो जाते हैं। 
'मैं' और सिर्फ 'मैं' यह अहंकार दुनिया की एक ऐसी चीज है जो मनुष्य का नाश कर डालता है। ये मनुष्य का सबसे बडा शत्रु है, परंतु अहंकार से ग्रस्त मनुष्य को इसका आभास नहीं हो पाता है। जिसके अंदर अहंकार बस गया,  वह अपनी जिंदगी में कुछ भी नहीं कर पाता है।  प्राचीन काल से आज तक के युग में जितने भी लोगों ने अहंकार किया है  उनका अहंकार ज्यादा समय तक  टिक नहीं पाया है व स्वयं अपने पतन का कारण बना। अहंकारी व्यक्ति स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मानता है और दूसरों को हीन समझ आजीवन एक झूठ का बोझ ढोता रहता है।  मनुष्य में जब तक यह  बोध नहीं आयेगा कि वो महज एक शरीर नहीं बल्कि आत्मा है तब तक वह भ्रमित करने वाले अहंकार से मुक्ति नहीं पा सकता है, दूसरों का सम्मान नहीं कर सकता है। 
सहज योग में हम जब जागृति पाते हैं और हमारी कुंडलिनी शक्ति जागृत होकर हमारे सिर के ऊपर स्थित सहस्त्रार चक्र का भेदन करती है तब हमें‌ स्वयं को देखने की विद्या प्राप्त हो जाती है। स्वयं का निरिक्षण हमें दुर्गुणों से दूर करता है।  और 'मैं' का अस्तित्व समाप्त होने लगता है।  हम साक्षी अवस्था को प्राप्त करते हैं यानि हम सजग हो जाते हैं निर्विचार हो जाते हैं।  हमारे सूक्ष्म शरीर में स्थित चक्र जागृत हो जाते हैं और चक्रों के गुण अर्थात् मूलाधार चक्र से अबोधिता और बुद्धि, स्वाधिष्ठान चक्र से शुद्ध विद्या व सृजनशीलता, नाभि चक्र से धर्म और संतोष, हृदय चक्र से आत्मविश्वास और निर्भयता, विशुद्धि चक्र से साक्षी भाव एवं स्वयं को देखने की शक्ति, आज्ञा चक्र से क्षमाशीलता व अंतर्दृष्टि  प्राप्त होती है और अंततः सहस्त्रार पर हम परमात्मा के साम्राज्य में प्रवेश कर जाते हैं।  हमारी बांई ओर की इड़ा नाड़ी जो भूतकाल की नाड़ी है और और दाहिनी ओर की पिंगला नाड़ी जो भविष्य की नाड़ी है वो संतुलित हो जाती और तभी हमारी सुषुम्ना नाड़ी पर स्थित चक्र क्रियाशील होते हैं और हमारे अंदर सर्वगुण प्रस्थापित होता है। तब हम अहंकार जैसे दुर्गुण से मुक्ति पा लेते हैं। 
सहज प्रक्रिया उतनी ही सहज है जितना धरती पर बोये गये एक बीज से पौधे का उगना, बढ़ना, प्लावित होना, फूलना फलना सहज है।  किसी जीवंत प्रक्रिया के लिए किसी प्रकार के  अतिरिक्त प्रयास की आवश्यकता नहीं होती है।  यही वो कारण है जिससे सहज योग आध्यात्मिक विज्ञान कहलाता है। स्वयं को जानने, अपनी अंतर्शक्ति को पहचानने व अपने सबसे बड़े शत्रु अहंकार से मुक्ति पाने के लिए जुड़े सहज योग से।  सहजयोग ध्यान केंद्र की जानकारी टोल फ्री नंबर 1800 2700 800 अथवा यूट्यूब चैनल लर्निंग सहजयोगा से प्राप्त कर सकते हैं। सहज योग पूर्णतया निशुल्क है

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