बचाओ — समय की सबसे बड़ी पुकार
आज का दौर विकास का है, लेकिन यह विकास अगर विनाश की कीमत पर हो रहा है तो उस पर गंभीर मंथन आवश्यक है। “बचाओ” आज केवल एक शब्द नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के अस्तित्व की चेतावनी बन चुका है। पानी, बिजली, जीवन, आबरू, पेड़, पर्यावरण और धरती—सब आज संरक्षण की मांग कर रहे हैं।
पानी बचाओ, क्योंकि पानी ही जीवन है। गिरता भूजल स्तर और सूखती नदियाँ इस बात का संकेत हैं कि हमने प्रकृति की सीमाओं को अनदेखा किया है। जल संरक्षण अब विकल्प नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता बन चुका है।
बिजली बचाओ, क्योंकि ऊर्जा संसाधन असीम नहीं हैं। अनावश्यक उपभोग आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों का हनन है। ऊर्जा की बचत ही भविष्य की रोशनी है।
जीवन बचाओ, क्योंकि आज मानवता सबसे बड़े संकट से गुजर रही है। हिंसा, प्रदूषण और असंवेदनशीलता ने जीवन मूल्यों को कमजोर किया है। हर जीवन—चाहे वह इंसान का हो या पशु-पक्षियों का—संरक्षण का अधिकारी है।
आबरू बचाओ, क्योंकि किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसकी नैतिकता से होती है। महिलाओं और बच्चों की गरिमा की रक्षा केवल कानून की नहीं, पूरे समाज की जिम्मेदारी है।
पेड़ों को बचाओ, क्योंकि पेड़ ही हमारी सांस हैं। अंधाधुंध कटाई ने प्रकृति का संतुलन बिगाड़ दिया है। एक पेड़ लगाना, एक जीवन बचाने के समान है।
पर्यावरण बचाओ, क्योंकि स्वच्छ हवा, स्वच्छ जल और स्वच्छ धरती के बिना जीवन संभव नहीं। बढ़ता प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन हमें आगाह कर रहे हैं कि अब भी नहीं संभले तो बहुत देर हो जाएगी।
धरती बचाओ, क्योंकि यही हमारा एकमात्र घर है। धरती का दोहन नहीं, संरक्षण ही सच्चा विकास है।
“बचाओ” कोई नारा नहीं, बल्कि समय की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
आज लिया गया सही निर्णय ही आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित करेगा।

— संपादक
गोपाल गावंडे
रंजीत टाइम्स

