द्वितीय नवरात्रि: मां ब्रह्मचारिणी की साधना एवं स्वाधिष्ठान चक्र जागरण का दिव्य अवसर
नवरात्रि का प्रत्येक दिन शक्ति की उपासना का विशेष अवसर होता है। द्वितीय नवरात्रि पर मां ब्रह्मचारिणी की आराधना की जाती है, जो संकल्प, तपस्या एवं आत्मबल की अधिष्ठात्री देवी हैं। इनकी साधना से स्वाधिष्ठान चक्र जागृत होता है, जो रचनात्मकता, आत्मनियंत्रण एवं ज्ञान से संबंधित है।
मां ब्रह्मचारिणी अपने भक्तों को यह संदेश देती हैं कि संयम, धैर्य एवं तपस्या के बिना आत्मज्ञान संभव नहीं है। आज के युग में जहां भौतिकता का आकर्षण बढ़ता जा रहा है, वहीं मानसिक और आत्मिक शांति का महत्व और भी अधिक हो गया है।
स्वाधिष्ठान चक्र और आत्मसंतुलन:
शास्त्रों के अनुसार, स्वाधिष्ठान चक्र हमारे जीवन की रचनात्मक ऊर्जा का केंद्र है। जब यह चक्र संतुलित होता है, तो व्यक्ति की विचारशीलता, कल्पनाशक्ति एवं बौद्धिक क्षमता में अद्भुत वृद्धि होती है। इसके विपरीत, असंतुलन होने पर मानसिक तनाव, भावनात्मक अस्थिरता एवं नकारात्मकता बढ़ने लगती है।
आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता:
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में आध्यात्मिक संतुलन अत्यंत आवश्यक हो गया है। मोबाइल और सोशल मीडिया के प्रभाव में व्यक्ति का मन अक्सर विचलित रहता है, जिससे मानसिक अशांति उत्पन्न होती है। इस संदर्भ में मां ब्रह्मचारिणी की उपासना एवं ध्यान हमें आत्मनियंत्रण, एकाग्रता एवं अंतर्मुखी होने का संदेश देती है।
स्वाधिष्ठान चक्र का जागरण केवल साधना से ही संभव है। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में नाद, योग एवं ध्यान को इस चक्र के जागरण के लिए आवश्यक बताया गया है। यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी सिद्ध किया गया है कि ध्यान एवं सकारात्मक ऊर्जा के प्रभाव से मनुष्य की स्मरण शक्ति, मानसिक स्पष्टता एवं निर्णय लेने की क्षमता बढ़ जाती है।
संदेश:
इस नवरात्रि, हम सभी को यह संकल्प लेना चाहिए कि आध्यात्मिक साधना, संयम एवं आत्मविश्लेषण को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाएँ। नवरात्रि केवल पर्व नहीं, बल्कि आत्मिक जागरण का एक महोत्सव है।
रंजीत टाइम्स के लिए
प्रधान संपादक - गोपाल गावंडे