आत्मारूपी दर्पण का दर्शन ही धर्म पथ की यात्रा का प्रारंभ है
श्री माताजी प्रणित सहजयोग ध्यान हमें हमारी बाह्य भौतिकता से मुक्त कर हमारे आत्मस्वरुप पर ध्यान करने की कला सिखाता है। यूं तो हम हमारी पंच ज्ञानेंद्रियों से केवल बाह्य जगत देख रहे हैं परंतु आत्मसाक्षात्कार प्राप्ति के बाद हम अपने आंतरिक सौंदर्य की झलक देख सकते हैं। ईश्वर की महिमा को अनुभूत कर सकते हैं। जब हमारी आदि मां कुंडलिनी भवसागर को पार करती है तो हममें धर्म जागृत होता है। धर्म की इस चैतन्यमयी अमृत धारा का अनेक गुणों के रूप में आप आनंद ले सकते हैं। परंतु इसे आप किसी पर थोप नहीं सकते है। हर किसी को धर्म रस का यह अमृतपान स्वयं ही करना होता है। धर्म आपकी अपनी एकाग्रता है, भीतर की ओर।
जैसे आप किसी को कुछ दान देना चाहते हैं तो वह केवल आपके और परमात्मा के बीच की बात होती है उसका बाहर कोई दिखावा नहीं होता। धर्म का आनंद तभी महसूस किया जा सकता है जब वह स्वयं तक सीमित हो वह साझा नहीं किया जा सकता। गुण साझा नहीं किए जा सकते। यदि कोई व्यक्ति गुणी है तो आप उसका समर्थन कर सकते हैं लेकिन उस धर्म का आनंद वह रस हृदय में गिरता है उसका आनंद कोई और नहीं भोग सकता। आप अपनी पवित्रता का आनंद स्वयं लेते हैं और यह बहुत सुखद व मधुर होता है। इसे पाने के लिए आपको अपने आत्मरूपी दर्पण को जानना होगा। इसे जानने के लिए श्री माताजी ने एक सुंदर दृष्टांत दिया है। वे कहते हैं,
ईश्वर जो सौंदर्य का स्त्रोत हैं वे अपने ही सौंदर्य को नहीं देख सकते। जैसे एक मोती अपने भीतर प्रवेश करके अपने सौंदर्य को नहीं देख सकता, आकाश अपने सौंदर्य को नहीं समझ सकता। सूर्य व तारे अपनी प्रभा को नहीं देख सकते, इसी प्रकार सर्व शक्तिमान ईश्वर भी अपने स्वरूप को नहीं देख सकते उन्हें एक दर्पण की आवश्यकता होती है और इसी कारण उन्होंने इस सुंदर सृष्टि को अपने दर्पण के रूप में रचा है।
प्रकृति के अनेक घटकों की रचना करने बाद उन्होंने मनुष्य की रचना की, परंतु अनेक योनियों में भटकने के बाद मिले इस जीवन को हम नशीले पदार्थ, अतिवाद, भौतिकता आदि में फंसकर नष्ट कर देते हैं। इसीलिए फंसता है क्योंकि वह नहीं जानता कि वह कितना महान है आनंद दायक और संपूर्ण है। परम पूज्य श्री माताजी कहते हैं कि हमने आप सभी साधकों के लिए एक दर्पण की खोज की है - वह है आत्मा का दर्पण। श्री माताजी कहते हैं, कि आत्म साक्षात्कार के पश्चात जो भी साधक आत्मा को अपनी चेतना, अपने चित्त में लाएगा वह उसमें अपना सुंदर प्रतिबिंब देख सकेगा और अपने भीतर के सारे कुविचार, कुसंस्कार और विनाशकारी चीजों को अनायास ही छोड़कर अपनी आनंद यात्रा पर निकल सकेगा।
नज़दीकी सहजयोग ध्यान केंद्र की जानकारी टोल फ्री नंबर 1800 2700 800 अथवा यूट्यूब चैनल लर्निंग सहजयोगा से प्राप्त कर सकते हैं।

