सहजयोग की पहचान: साक्षी भाव और संयमित वाणी

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जीभ और साक्षी भाव : सहज योगी के आंतरिक विकास का आधार

परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी ने 2 अप्रैल 1976 को दिल्ली में दिए गए अपने अमूल्य संदेश में सहज योगियों के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय पर प्रकाश डाला—"साक्षी भाव" और "जीभ पर नियंत्रण"।
श्री माताजी ने कहा कि एक सहज योगी का जीवन साक्षी भाव की शक्ति से संचालित होना चाहिए। साक्षी भाव वह अवस्था है जहाँ व्यक्ति घटनाओं, विचारों और परिस्थितियों को बिना प्रतिक्रिया और बिना आसक्ति के केवल देखता है। यह शक्ति मौन में निवास करती है। मौन का अर्थ केवल शब्दों का अभाव नहीं, बल्कि मन की स्थिरता और आत्मा की जागरूकता है।
आज के युग में मनुष्य का अधिकांश समय बोलने, प्रतिक्रिया देने और अपने विचारों को व्यक्त करने में व्यतीत होता है। परन्तु श्री माताजी स्पष्ट रूप से बताती हैं कि अत्यधिक बोलना आध्यात्मिक प्रगति में बाधा बन सकता है। उन्होंने सहज योगियों को सलाह दी कि वे तभी बोलें जब वास्तव में आवश्यकता हो, और जब बोलें तो उनके शब्द कम, स्पष्ट तथा निर्णायक हों।
जीभ : सबसे अधिक भटकाने वाला अंग
श्री माताजी ने एक अत्यंत गहन सत्य बताया कि सभी इंद्रियों और अंगों में जीभ सबसे अधिक भटकाव में माहिर है। जीभ केवल बोलने का साधन नहीं है, बल्कि यह स्वाद, अभिव्यक्ति, आलोचना, प्रशंसा और अनेक प्रकार की प्रतिक्रियाओं का माध्यम भी है।
अक्सर मनुष्य अपनी वाणी के कारण विवादों में पड़ता है, संबंधों को क्षति पहुँचाता है और अपनी आंतरिक शांति को खो देता है। बिना सोचे-समझे बोले गए शब्द वर्षों तक पीड़ा का कारण बन सकते हैं। इसके विपरीत, नियंत्रित और जागरूक वाणी प्रेम, शांति और सामंजस्य का निर्माण करती है।
श्री माताजी का कथन है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी जीभ पर महारत प्राप्त कर लेता है, तो वह अन्य सभी इंद्रियों और प्रवृत्तियों पर भी नियंत्रण स्थापित कर सकता है। इसका कारण यह है कि वाणी मन और अहंकार का प्रत्यक्ष प्रतिबिंब होती है। जब वाणी शुद्ध होती है, तब विचार भी शुद्ध होने लगते हैं।
श्री माताजी का यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना 1976 में था। साक्षी भाव और जीभ पर नियंत्रण, दोनों ही आत्म-साक्षात्कार के बाद के विकास के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। एक सहज योगी के लिए वास्तविक प्रगति केवल ध्यान में बैठने से नहीं, बल्कि अपनी वाणी, विचारों और प्रतिक्रियाओं को आत्मा के प्रकाश में परिवर्तित करने से होती है।
जब शब्द कम होते हैं, तब आत्मा अधिक बोलती है। और जब साक्षी भाव स्थापित हो जाता है, तब जीवन सहज रूप से दिव्यता की ओर अग्रसर होने लगता है।
सहज योग के बारे में अधिक जानकारी हेतु टोल-फ्री नंबर 1800-270-0800 पर या वेबसाइट www.sahajayoga.org.in पर संपर्क कर सकते हैं। सहज योग पूर्णतः निःशुल्क है।

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