आत्मा का प्रकाश सदैव स्पंदन युक्त व शुद्ध होता है

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प्रकाश एक प्रकार की ऊर्जा है जो हमारी आंखों को संवेदित करता है। प्रकाश स्रोत से निकलकर वस्तु पर पड़ता है तथा इनसे परावर्तित होकर आंखों को संवेदित कर वस्तु के होने का ज्ञान कराता है। प्रकाश की अनुपस्थिति में वस्तुएं होकर भी नहीं होती हैं। यह स्थूल जगत का वैज्ञानिक तथ्य है। हमारे सूक्ष्म शरीर में आत्मा प्रकाश बनकर ज्योतित होती है आत्मा का प्रकाश सदैव स्पंदन युक्त व शुद्ध होता है सूर्य के प्रकाश में हम स्थूल जगत को समझ पाते हैं परंतु आत्मा के प्रकाश में स्थूल व  सूक्ष्म  दोनों ही जीवन प्रकाशित होते हैं। आत्मप्रकाश कितना विस्तारित हो सकता है यह निर्भर करता है कि आप की चेतना का स्तर क्या है? चेतना का स्तर जितना उच्च होता है आपकी दृष्टि उतनी ही प्रकाशित होती है और इस प्रकाश में साधक दैवीय स्पंदनों व  अनुभवों का साक्षी बनता है। अनेक महापुरुषों के चित्र में प्रदर्शित प्रकाश वृत्त इसी चेतना का प्रतीक है। क्योंकि आत्मा व्यैक्तिक ना होकर ब्रह्मांड व्यापी है अतः उसकी चेतना का स्तर भी विश्वव्यापी होता है। और इस चेतना का प्राकट्य मात्र प्रेम के रूप में होता है।  श्री माताजी निर्मला देवी द्वारा प्रतिस्थापित सहज योग साधक के अंत में इसी चेतना की जागृति करता है इस संदर्भ में श्री माताजी ने वर्णित किया है कि,
".... आत्मा का प्रकाश आपको धीरे-धीरे सब कुछ बताएगा, जितना आप इसे सहन कर सकते हैं। यह आपको कुछ ऐसा नहीं बताएगा जिसे आप सहन नहीं कर सकते। यह एक बहुत अच्छी समरुप तुलना है, जब हम यह कहते हैं कि,"आप एक प्रकाश हैं", लेकिन यह प्रकाश जो आपके पास है, वह इस मामूली प्रकाश से बहुत अलग है। साधारण प्रकाश समझता नहीं है। वह सोचता नहीं है। अब जो प्रकाश आपके पास है, यह वो प्रकाश है जो समझता है, सोचता है और यह आपको उतनी ही रोशनी देता है जितनी आप सहन कर सकते हैं। यह दमकेगा नहीं। अगर यह कौंधेगा, तो आप हक्‍के बक्‍के हो जाएंगे। यह धुंधला नहीं पड़ेगा। यह पूर्णतया उसी अनुपात में रहेगा जितना आप समझ सकते हैं।" (२१ जुलाई १९९३)
आत्मा का यह प्रकाश भौतिक जगत की अस्थिरताओं, कठिनाईयों, दुविधाओं में आपका विवेकयुक्त मार्गदर्शन करता है तथा अक्षुण्ण आनंद प्रदान करता है। इस प्रकाश से साक्षात्कार हेतु सहजयोग से संबंधित  जानकारी  टोल फ्री नं – 1800 2700 800 अथवा यूट्यूब चैनल लर्निंग सहजयोगा से प्राप्त कर सकते हैं।

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