माघ का महीना आत्मज्ञान की प्राप्ति व परमात्मा से योग का अवसर
माघ का महीना पहले माध का महीना था, जो बाद में माघ हो गया. माध शब्द का संबंध श्री कृष्ण के एक स्वरूप "माधव" से है। इस महीने को अत्यंत पवित्र माना जाता है। इस महीने में ढेर सारे धार्मिक पर्व आते हैं , साथ ही प्रकृति भी अनुकूल होने लगती है। इसी महीने में संगम पर "कल्पवास" भी किया जाता है, मान्यता अनुसार इससे व्यक्ति शरीर और आत्मा से नवीन हो जाता है। माघ मास में दान करने का भी विशेष महत्व होता है। साथ ही इस माह में ही मौनी अमावस्या पर्व भी आता है जो मौन के महत्व को रेखांकित करता है। इसी माह में मां शारदा की आराधना का पर्व वसंत पंचमी भी मनाया जाता है। भारतीय संस्कृति का निर्धारण मनीषियों द्वारा गणितीय, वैज्ञानिक, प्राकृतिक, शारीरिक, आध्यात्मिक व आत्मिक दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर किया गया है। आधुनिक समय में अधिकांश व्यक्ति या तो इन सूक्ष्मताओं से अनभिज्ञ होते हैं अथवा इन्हें अत्यंत सतही तौर पर मानते हैं।
वास्तव में यह पूर्ण मास सूक्ष्म शरीर को संतुलित कर परमात्मा से योग का अवसर प्रदान करता है। हमारे सूक्ष्म शरीर के प्रमुख छ: चक्रों की जागृति का विधान हमारी संस्कृति निर्माताओं ने हमें इस माह में सहज ही प्रदान किया है। कल्पवास की योजना हमें पवित्रता की ओर ले जाती है जिससे मूलाधार चक्र की जागृति संभव हो सकती है। इसके पश्चात इस माह में दान का महत्व बताया गया है, जब हम अपनी अर्जित संपत्ति का प्रयोग जरूरतमंद लोगों के लिए करते हैं तो मां लक्ष्मी की कृपा के पात्र बनते हैं अर्थात नाभि चक्र की जागृति का मार्ग खुलता है। मौन हमें बाह्य जगत से आत्मा की ओर ले जाता है जिससे हृदय चक्र की ओर हमारी दृष्टि जाती है। इसके पश्चात् हम ज्ञान को आत्मसात करने के लिए पूर्णतया तैयार होते हैं और तब हम वसंत पंचमी पर मां सरस्वती की आराधना द्वारा स्वाधिष्ठान चक्र की जागृति करते हैं। माधव मास की साधना व मौन हमारे विशुद्धि चक्र की शुद्धता में सहायक होता है। आत्मज्ञान की प्राप्ति हमें द्वेष व अहंकार से मुक्ति प्रदान करती है व आज्ञा चक्र की जागृति का मार्ग प्रशस्त होता है।
परंतु साधना में कमी यह रह जाती है कि प्रत्येक व्यक्ति इस सूक्ष्म संरचना को समझ नहीं पाता और यदि ज्ञान की प्राप्ति होती भी है तो वह स्थिर नहीं रह पाती सांसारिक जीवन से जुड़ते ही पुनः भौतिकता व माया मन को उलझाने लगती है । इसका सहज समाधान सहजयोग संस्थापिका श्री माताजी निर्मला देवी जी ने कुंडलिनी जागरण द्वारा आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति के रूप में हमारे समक्ष प्रस्तुत किया है। सहजयोग ध्यान द्वारा किसी विशेष अवसर पर नहीं वरन् प्रतिपल जागृत, संतुलित व परमात्मा से योग की अवस्था को प्राप्त कर सकते हैं। इस अनुभव का एक अवसर इस पवित्र मास में स्वयं को अवश्य प्रदान करें।
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