कुण्डलिनी जागरण से प्रकट होता है श्री लक्ष्मी का राजराजेश्वरी स्वरूप

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"अगर आप में किसी भी चीज़ का लालच आ जाये तो सोच लें, राजराजेश्वरी आपसे मुँह मोड़कर चली गयी है।"
— परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी
(श्री राजराजेश्वरी पूजा, हैदराबाद, 21 जनवरी 1994)


सहजयोग में कुण्डलिनी जागरण केवल आत्मसाक्षात्कार प्राप्ति की घटना नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के भीतर स्थित विभिन्न दिव्य गुणों के क्रमिक जागरण की प्रक्रिया है। जब आदिशक्ति स्वरूपिणी कुण्डलिनी मूलाधार से उठकर विभिन्न चक्रों को प्रकाशित करती है, तब साधक के भीतर आध्यात्मिक विकास के नए आयाम खुलते जाते हैं। इसी आध्यात्मिक यात्रा में नाभि चक्र का विशेष महत्व है, जहाँ आदिशक्ति का राजराजेश्वरी स्वरूप प्रकट होता है।
परम पूज्य श्री माताजी ने बताया कि राजराजेश्वरी, लक्ष्मी तत्व की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है। जब जागृत कुण्डलिनी नाभि चक्र को पोषित करती है, तब साधक के भीतर केवल भौतिक समृद्धि की भावना नहीं आती, बल्कि संतोष, धर्म, उदारता और आंतरिक गरिमा का विकास होता है। यही कारण है कि नाभि चक्र को संतुलन और संतोष का केंद्र माना गया है।
कुण्डलिनी जागरण से पहले मनुष्य की इच्छाएँ प्रायः बाहरी वस्तुओं, उपलब्धियों और संग्रह के इर्द-गिर्द घूमती हैं। उसे लगता है कि अधिक धन, अधिक प्रतिष्ठा या अधिक अधिकार से सुख प्राप्त होगा। किंतु जब कुण्डलिनी जागृत होकर नाभि चक्र को प्रकाशित करती है, तब साधक अनुभव करता है कि वास्तविक समृद्धि भीतर से उत्पन्न होती है। उसका ध्यान संग्रह से हटकर संतोष की ओर और स्वार्थ से हटकर उदारता की ओर बढ़ने लगता है।
राजराजेश्वरी की अवस्था कुण्डलिनी के उस कार्य को दर्शाती है जिसमें वह साधक को "मैं" और "मेरा" की सीमाओं से ऊपर उठाकर दिव्य चेतना से जोड़ती है। इस अवस्था में व्यक्ति के भीतर सहज नम्रता आती है। वह स्वयं को किसी उपलब्धि का स्वामी नहीं मानता, बल्कि ईश्वरीय कृपा का पात्र समझता है। यही कारण है कि श्री माताजी ने कहा कि जो वास्तव में परिपूर्ण होता है, वह अत्यंत नम्र और सरल होता है।
कुण्डलिनी जागरण का एक महत्वपूर्ण संकेत यह भी है कि व्यक्ति के भीतर लालच कम होने लगता है। लालच नाभि चक्र के संतुलन को भंग करता है और मनुष्य को पुनः भौतिक आकर्षणों में बाँध देता है। इसलिए श्री माताजी का यह कथन अत्यंत गहन आध्यात्मिक सत्य को प्रकट करता है कि यदि लालच उत्पन्न हो जाए तो समझ लेना चाहिए कि राजराजेश्वरी का आशीर्वाद उस क्षण कमज़ोर पड़ रहा है। जागृत कुण्डलिनी सदैव संतोष, संतुलन और मर्यादा की ओर ले जाती है, जबकि लालच मनुष्य को असंतोष और असंतुलन की ओर खींचता है।
सहजयोग में जब साधक नियमित ध्यान करता है और उसकी कुण्डलिनी बार-बार नाभि चक्र को शुद्ध एवं सशक्त करती है, तब उसके भीतर राजराजेश्वरी के गुण प्रकट होने लगते हैं। वह जीवन की परिस्थितियों में संतुलित रहता है, भौतिक साधनों का उचित उपयोग करता है, दूसरों के प्रति उदार रहता है और किसी भी प्रकार के अहंकार या लालच से दूर रहने का प्रयास करता है। यही वास्तविक आध्यात्मिक समृद्धि है।
इस प्रकार राजराजेश्वरी कोई बाहरी देवी स्वरूप मात्र नहीं हैं, बल्कि कुण्डलिनी जागरण के माध्यम से साधक के भीतर प्रकट होने वाली वह दिव्य अवस्था हैं जहाँ संतोष, धर्म, नम्रता और आत्मिक वैभव का पूर्ण विकास होता है। जब नाभि चक्र में आदिशक्ति का यह स्वरूप प्रकाशित होता है, तब साधक समझ पाता है कि सच्चा धन बाहरी संग्रह में नहीं, बल्कि जागृत आत्मा की शांति, संतुलन और ईश्वरीय प्रेम में निहित है।
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