धर्मस्थलों में पारदर्शिता: समय की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता
लेखक: अमित चौहान
भारत विविध आस्थाओं और संस्कृतियों का देश है। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और चर्च करोड़ों लोगों की श्रद्धा के केंद्र हैं। इन धार्मिक संस्थानों की सामाजिक और सांस्कृतिक भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसलिए इनके प्रति लोगों का विश्वास बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।
आज समय की मांग है कि धार्मिक संस्थानों में प्राप्त होने वाले दान और चढ़ावे के प्रबंधन में पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए। यह व्यवस्था किसी एक धर्म तक सीमित न होकर सभी धर्मों के धार्मिक संस्थानों पर समान रूप से लागू होनी चाहिए। यदि वित्तीय ऑडिट या जांच की व्यवस्था हो, तो उसके नियम सभी के लिए एक जैसे हों।
दान और चढ़ावे का अधिकतम लेन-देन डिजिटल माध्यम से किया जाए, जिससे नकद लेन-देन में होने वाली अनियमितताओं और चोरी जैसी घटनाओं पर रोक लग सके। साथ ही प्रत्येक धार्मिक संस्थान की आय, व्यय और विकास कार्यों का वार्षिक विवरण सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध कराया जाए, ताकि श्रद्धालु यह जान सकें कि उनके द्वारा दिया गया दान किस उद्देश्य के लिए उपयोग किया गया।
इस दिशा में एक स्वतंत्र और निष्पक्ष नियामक संस्था अथवा मंत्रालय पर भी विचार किया जा सकता है, जिसमें सभी धर्मों के प्रतिनिधियों और वित्तीय विशेषज्ञों की समान भागीदारी हो। इसका उद्देश्य धार्मिक गतिविधियों में हस्तक्षेप करना नहीं, बल्कि वित्तीय पारदर्शिता, जवाबदेही और सुशासन सुनिश्चित करना होना चाहिए।
यदि किसी धार्मिक संस्थान को विकास कार्यों के लिए धन आवंटित किया जाता है, तो उसकी पूरी जानकारी सार्वजनिक हो। इसी प्रकार, वहां कार्यरत कर्मचारियों का रिकॉर्ड और प्रशासनिक व्यवस्था भी सुव्यवस्थित हो। इससे श्रद्धालुओं का विश्वास और मजबूत होगा तथा धार्मिक संस्थानों की गरिमा भी बनी रहेगी।
लोकतंत्र में सरकारों का दायित्व केवल कानून बनाना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था विकसित करना भी है जो सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार करे। धार्मिक आस्था का सम्मान करते हुए पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना देशहित में एक सकारात्मक कदम हो सकता है।
यह विषय राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हित और सुशासन के दृष्टिकोण से विचार किए जाने योग्य है। आस्था और पारदर्शिता साथ-साथ चलें, तभी समाज और राष्ट्र दोनों अधिक मजबूत बनेंगे।
अमित चौहान
दिल्ली

