अल्पायु में हृदयाघात के कारणों को समझें सहजयोग ध्यान (आध्यात्मिक विज्ञान) द्वारा

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आजकल युवाओं सहित सभी आयु वर्ग में हृदयघात (Heart Attack) के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, डाक्टर्स के अनुसार इसका मुख्य कारण गतिहीन जीवनशैली, अस्वास्थ्यकर आहार, अत्यधिक तनाव, धूम्रपान, और नींद की कमी हैं। साथ ही,  उच्च रक्तचाप, मधुमेह, मोटापा और अनुवांशिक कारण भी इसमें बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।   
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से विचार करें तो हृदय चक्र सर्वाधिक महत्वपूर्ण चक्र है क्योंकि यह आरोग्यदायी और चैतन्यमय व्यक्तित्व का मूल है। हमारी आत्मा  शिव‌स्वरुप में हमारे हृदय में है,  जिसका प्रतिबिंब हमारे मस्तिष्क क्षेत्र यानि सहस्त्रार तक है। हमारे सुक्ष्म शरीर में हृदय अनाहत चक्र से जुड़ा हुआ है, जो हमारे शरीर का चौथा चक्र है जो प्रेम, करुणा और आत्म-प्रेम की भावनाओं को नियंत्रित करता है। हम यह जानने का प्रयास करते हैं कि किस प्रकार सहजयोग विद्या का आध्यात्मिक साईंस हृदय की कार्य प्रणाली व हृदय की अस्वस्थता के कारण को स्पष्ट करता है। 
     हम सभी जानते हैं हृदय में चार वाल्व हैं।  सहज योग के अनुसार चार सुक्ष्म नाड़ियां है:- पहली नाड़ी मूलाधार चक्र तक जाती‌ है जो हमारे सुक्ष्म शरीर का प्रथम चक्र है, और रीढ़ की हड्डी के नीचे स्थित है। यह हमारे शरीर का मूल आधार है, आध्यात्म के अनुसार मूलाधार चक्र में श्री गणेश का स्थान है जो पवित्रता और अबोधिता का गुण लिये हुए हैं तथा सदैव बाल स्वरूप में हैं। सहजयोग प्रणेता परमपूज्य श्री माताजी ने बताया है इस चक्र के नीचे नरक का द्वार है। अपवित्र, अमर्यादित और अनैतिकता वाले व्यक्ति अपनी गंदी प्रवृत्ति के कारण नरक के पात्र बन जाते हैं।
हृदय की दूसरी नाड़ी हमारी इच्छा को पूर्ण करती है।  यह इच्छा भौतिक हो या भावनात्मक इसका मर्यादा में होना आवश्यक है, अन्यथा व्यक्ति का पतन निश्चित है। हृदय के अच्छे स्वास्थ्य के लिए सहज योगी को अपनी इड़ा नाड़ी (left sympathetic nervous system) पर नियमित ध्यान कर अशुद्ध इच्छा को शुद्ध इच्छा में परिवर्तित करना होता है, ताकि हमारे अंदर चैतन्य का प्रवाह बढ़े और हम निरोगी रहें।  हम अपने चित्त को सुंदर प्रकृति से जोड़कर प्राकृतिक सौंदर्य  व पवित्र वस्तुओं का आनंद ले सकते हैं।  इससे हमारा हृदय पुलकित, आनंदित और स्वस्थ रहता है। 
तीसरी नाड़ी हममें मोहमाया उत्पन्न करती है।  परिवार की, रिश्तेदारों व मित्रों की, धन-दौलत व अन्य वस्तुओं की मोहमाया। इस मोहमाया में डूबना हमारे हृदय को कमजोर करता है।  सहज योग ध्यान साधना से हम समर्पित होते हैं और हममें साक्षी भाव आता है, प्राणी मात्र के लिए हृदय में दया भाव होता है और हम स्वार्थ रहित होकर विश्व का हित सोचते हैं।
चौथी नाड़ी सर्वाधिक महत्वपूर्ण नाड़ी है। यह नाड़ी हृदय से शुरु होकर बांयी विशुद्धि (गले में स्थित है)  से होते हुये आज्ञा चक्र(माथे पर स्थित है) से सहस्त्रार(सिर के तालु भाग) तक जाती है।  इस चौथी नाड़ी में चार पंखुड़ी है।  यह चारों पंखुड़ी जब लिंबिक एरिया में खुलती हैं तब साधक तुर्या समाधि में जाकर निर्विचारिता प्राप्त करता है। इस अवस्था में हमें परमेश्वर को समझने का सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है । जब तक हृदय चक्र की चौथी नाडी नहीं खुलती है तब तक हम अंधकार मे रहते हैं।  
अतः हमारी मानसिक स्थिति व कमजोर भावनायें ही हमें हृदय रोगी बनाती है। सहजयोग में जब हम ध्यान करते हैं तब  हृदय चक्र की चारों नाड़ियां पूर्णतया प्रकाशित हो जाती है और हमें निर्विचारिता और परमात्मा का ज्ञान मिलता है। आत्मसाक्षात्कार  को प्राप्त करने हेतु अपने नज़दीकी सहजयोग ध्यान केंद्र की जानकारी टोल फ्री नंबर 1800 2700 800 से प्राप्त कर सकते हैं।  सहज योग सदैव नि:शुल्क है।

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