मातृभूमि की आध्यात्मिक साधना है ‘‘वंदे मातरम्’’
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जिस गीत ने सबसे प्रबल राष्ट्रीय चेतना, उत्साह और मातृभूमि के प्रति भक्ति का संचार किया है, वह है — ‘वंदे मातरम्’।
बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत भारत की सांस्कृतिक, दार्शनिक, आध्यात्मिक और राष्ट्रीय चेतना का सजीव प्रतीक है। इसमें निहित भाव अपनी ‘मातृभूमि के रूप में ईश्वर के दर्शन’ का दार्शनिक उद्बोधन है।
‘वंदे मातरम्’ की रचना 7 नवम्बर 1875 को पूर्ण हुई थी, जिसका प्रकाशन बंकिमचंद्र रचित प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ में अंतिम गीत के रूप में 1882 में हुआ था। इस गीत ने सदियों से सुप्त भारत देश को जागृत किया और भारत की स्वतंत्रता में अहम योगदान दिया। यह गीत केवल राष्ट्रभक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय दर्शन, शक्ति तत्त्व और भक्ति परंपरा का गूढ़ आध्यात्मिक दर्शन भी प्रस्तुत करता है।
भारतीय परंपरा में मातृभूमि को भौतिक वस्तु नहीं, बल्कि जीवंत चेतना माना गया है।
अथर्ववेद में कहा गया है —
> “माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः”
— अथर्ववेद 12/1/12
अर्थात् — भूमि मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ।
‘वंदे मातरम्’ इसी पवित्र भावना का प्रकटीकरण है। यह गीत मातृभूमि की वंदना का गीत है, उस शक्ति की आराधना का गीत है, जो सम्पूर्ण जीवन को पोषित करती है।
‘वंदे मातरम्’ का अर्थ है — हे मातृभूमि! तुझे प्रणाम।
यह गीत पवित्र भारत भूमि को देवी स्वरूप मानकर उसकी वंदना करता है। यह भारत की आत्मा का स्वर है — एक ऐसा मंत्र जो भक्ति, दर्शन और संस्कृति — तीनों के समन्वय से उत्पन्न हुआ है।
गीत की प्रथम पंक्तियाँ भारत भूमि के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन करती हैं —
> “सुजलाम् सुफलाम् मलयजशीतलाम् शस्यश्यामलाम् मातरम्”
अर्थात् — हे मातृभूमि! तू जल से परिपूर्ण है, फल और अन्न से सम्पन्न है, चंदन की शीतल पवन से शीतल है और धान्य से हरित भूमि है।
यह दृश्य जीवनदायिनी भारत भूमि का प्रतीक है।
यहाँ ‘जल’, ‘फल’ और ‘शस्य’ भौतिक समृद्धि का प्रतीक हैं, जबकि ‘मलयजशीतलाम्’ आध्यात्मिक शांति और प्रार्थना का। इस प्रकार यह गीत हमें भौतिक और आध्यात्मिक दोनों अनुभूतियों की ओर ले जाता है।
‘वंदे मातरम्’ भारतीय दर्शन के दो प्रमुख तत्त्वों — अद्वैत वेदान्त और शक्ति सिद्धांत का अद्भुत संगम है।
आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त के अनुसार —
> “सर्वं खल्विदं ब्रह्म”
— अर्थात समस्त जगत ब्रह्म की ही अभिव्यक्ति है।
इस दृष्टि से भारत भूमि स्वयं ब्रह्मस्वरूपा है।
जब हम ‘वंदे मातरम्’ कहते हैं, तो वस्तुतः हम ब्रह्मस्वरूपा प्रकृति को प्रणाम करते हैं और मातृभूमि के माध्यम से ईश्वर की आराधना करते हैं।
इसी तरह ‘वंदे मातरम्’ में शक्ति के दर्शन भी होते हैं —
> “या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमो नमः”
बंकिमचंद्र ने ‘वंदे मातरम्’ में मातृभूमि को एक साथ दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के रूप में प्रस्तुत किया है —
> “त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी, कमला कमलदलविहारिणी, वाणी विद्यादायिनी”
अर्थात् — हे मातृभूमि! तू दसों अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाली दुर्गा है, कमलदल पर विचरण करने वाली लक्ष्मी है और ज्ञान देने वाली सरस्वती है।
यह त्रिगुणात्मक रूप भारतीय दर्शन के शक्ति सिद्धांत का प्रतीक है।
सृष्टि, स्थिति और संहार — तीनों शक्तियाँ मातृभूमि में समाहित हैं।
‘वंदे मातरम्’ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें राष्ट्रभक्ति और ईश्वरभक्ति में कोई भेद नहीं है। इसमें देशभक्ति को धर्म और देवभक्ति के स्तर तक उठाया गया है। मातृभूमि यहाँ साक्षात ईश्वर की अभिव्यक्ति है —
> “ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति” — गीता 18/61
“ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः” — गीता 15/7
इस प्रकार जब प्रत्येक हृदय में ईश्वर है, तो राष्ट्र के सामूहिक स्वरूप में भी वह विद्यमान है।
मातृभूमि की वंदना भी ईश्वरभक्ति का ही रूप है।
भारतीय संस्कृति में मातृत्व को सर्वोच्च आदर्श माना गया है। माता केवल जन्मदात्री नहीं बल्कि पालक, जनक और रक्षक भी होती है।
‘वंदे मातरम्’ में भारत माता को यही रूप दिया गया है —
वह पालनकर्ता (शस्यश्यामला), प्रेममयी (सुहासिनी), वरदायिनी (वरदामात), और रक्षिका (रिपुदलवारिणी) है।
‘वंदे मातरम्’ हमें व्यक्तिगत जीवन से उठाकर सामूहिक चेतना और राष्ट्रीय संकल्प की ओर ले जाता है।
जब कोई भारतीय ‘वंदे मातरम्’ कहता है, तो वह केवल अपने देश के प्रति सम्मान नहीं जताता, बल्कि अपनी मातृभूमि की आध्यात्मिक साधना करता है।
स्वाधीनता आंदोलन में यह गीत राष्ट्रीय चेतना का सबसे बड़ा प्रेरक रहा है।
दुर्भाग्य से मोहम्मद अली जिन्ना जैसे कट्टरपंथियों ने ‘वंदे मातरम्’ का विरोध किया और इसे धार्मिक असहिष्णुता से जोड़ा, जिससे इसका मूल पाठ कम कर दिया गया।
आज भी कुछ लोग इसका विरोध करते हैं, जो संकीर्ण मानसिकता का परिचायक है।
‘वंदे मातरम्’ मातृभूमि की स्तुति का गीत है। कोई भी धर्म अपनी मातृभूमि से ऊपर नहीं हो सकता। अतः इसका विरोध राष्ट्रविरोध के समान है।
देवता भी भारत भूमि की प्रशंसा करते हैं —
> “जयन्ति देवाः क्रियया सदा भूताः धन्यास्ते भारतभूमिभाग्याः” — विष्णु पुराण 2/3/24
अर्थात् — जिन्होंने भारत भूमि पर जन्म लिया, वे देवताओं से भी अधिक धन्य हैं।
‘वंदे मातरम्’ अपनी 150 वर्षों की यात्रा पूरी कर चुका है।
इन वर्षों में यह गीत मातृभूमि की आराधना और राष्ट्रीय चेतना का सबसे बड़ा सूत्रधार रहा है।
जब विश्व भौतिकता और विभाजन की प्रवृत्ति से ग्रस्त है, तब यह गीत हमें याद दिलाता है कि सच्चा राष्ट्रप्रेम भौतिक नहीं, आध्यात्मिक होता है।
‘वंदे मातरम्’ भारतीय दर्शन का मूल है —
यह भक्ति को राष्ट्रसेवा में और राष्ट्रसेवा को आत्मसाधना में रूपांतरित करता है।
यह गीत हमारे जीवन, संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना का आध्यात्मिक उद्घोष है —
जो कहता है कि भारत केवल एक भूखंड नहीं, बल्कि ‘ब्रह्म का सजीव प्रतिमान’ है।
वंदे मातरम्।
✍️ डॉ. जीवन एस. रजक
संयुक्त कलेक्टर एवं साहित्यकार

