पानी रे पानी तेरा रंग कैसा…गंदे पानी ने ली मासूम की जान, ज़मीर पर सवाल
इंदौर | राजेश धाकड़
"कली खिले तो झट आ जाए,"
"पतझड़ का पैग़ाम,"
"पानी रे पानी तेरा रंग कैसा…"
दस वर्षों की प्रभु-प्रार्थना के बाद जिस मासूम ने घर की देहरी पर किलकारियाँ बिखेरी थीं, आज वही नन्हा “देव” काल-कवलित हो गया। चंचल मुस्कान, लुभावनी हँसी और कभी भूख से उठता रुदन—उसने अभी ठीक से चलना भी नहीं सीखा था। ज़मीन पर कदम रखने से पहले ही ज़िंदगी उससे छिन गई।
वह दुनिया का चलन कैसे समझता,
जब चलना ही नहीं सीखा था?
बताया जा रहा है कि गंदे व ज़हरीले पानी के कारण मासूम की जान गई। एक तरफ़ परिवार पर दुखों का पहाड़ टूटा है, तो दूसरी ओर राजनीति करने वालों का ज़मीर जैसे गहरी नींद में सो गया है।
मौतों पर विधवा-विलाप किया जा रहा है,
लेकिन जान की कीमत तय की जा रही है—
“करोड़… दो करोड़…”
आंदोलन, धरना-प्रदर्शन और बयानबाज़ी के ज़रिये जनता को बरगलाने की कोशिशें जारी हैं। पानी में फैले ज़हर पर मानो नृत्य किया जा रहा हो, जबकि तंत्र में घुले ज़हर को छुपाया जा रहा है। कारण साफ़ है—हर कोई इस तंत्र से “उगाही मंत्र” का प्रयोग करता आ रहा है।
आज की सत्ता में पानी से हो रही मौतों का शोर गूंज रहा है, लेकिन कल के अपने (कु)कर्म और पाप भुला दिए गए हैं। सवाल यह नहीं कि बयान किसने दिया, सवाल यह है कि ज़िम्मेदार कौन है?
कौन जानता है कि यदि वह मासूम ज़िंदा रहता, तो
परिवार, समाज और देश के लिए
क्या कुछ बन सकता था…
मौतों के ज़िम्मेदार कब और कैसी सज़ा पाएँगे, यह समय तय करेगा,
लेकिन इतना तय है कि
पानी पीने से जिनकी जान गई,
और जो आज राजनीति कर रहे हैं—
उनका ज़मीर मर चुका है।
"पानी रे पानी तेरा रंग कैसा"
"सौ साल जीने की उम्मीदों जैसा…"

