हाँ, मैं एक पत्रकार हूँ… मेरा अधिकार है सवाल पूछना
सवाल करना अपराध नहीं, लोकतंत्र की पहचान है
हाँ, मैं एक पत्रकार हूँ।
आदित्य शर्मा
सह. संपादक रणजीत टाइम्स
मेरे हाथ में कलम है, मेरे सामने समाज है और मेरे सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी है — सच को सामने लाना।
मैं सवाल पूछता हूँ, क्योंकि सवाल करना मेरा अधिकार है।
मैं जवाब मांगता हूँ, क्योंकि जनता को जवाब मिलना उसका अधिकार है।
मैं मुद्दे उठाता हूँ, क्योंकि जिन लोगों की आवाज व्यवस्था के गलियारों तक नहीं पहुंच पाती, उनकी आवाज बनना पत्रकारिता का धर्म है।
पत्रकारिता केवल खबर लिखने का नाम नहीं है। पत्रकारिता का अर्थ है — सच की तलाश करना, तथ्यों को सामने रखना, व्यवस्था से जवाब मांगना और जनता के हित से जुड़े मुद्दों को मजबूती से उठाना।
इसलिए जब कोई पत्रकार किसी अधिकारी से सवाल करता है, किसी जनप्रतिनिधि से सवाल करता है, किसी सरकारी विभाग से जानकारी मांगता है या किसी व्यवस्था में हुई गड़बड़ी पर सवाल उठाता है, तो इसे व्यक्तिगत विरोध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
सवाल व्यक्ति से नहीं, व्यवस्था से होता है।
पत्रकार सवाल क्यों पूछता है?
क्योंकि आम आदमी हर जगह जाकर सवाल नहीं पूछ सकता।
एक गरीब व्यक्ति सरकारी कार्यालय के चक्कर लगाते-लगाते थक सकता है। एक आम नागरिक अपनी शिकायत लेकर कई बार अधिकारियों के सामने जा सकता है। किसी व्यक्ति की फाइल महीनों तक किसी कार्यालय में पड़ी रह सकती है। किसी सड़क, नाली, भवन, योजना या सरकारी काम में लापरवाही दिखाई दे सकती है।
लेकिन जब पत्रकार उस विषय पर सवाल उठाता है, तो वही मुद्दा सार्वजनिक चर्चा का विषय बन जाता है। यही पत्रकारिता की ताकत है।
पत्रकार जनता और व्यवस्था के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी है।
सवाल से डर क्यों?
कई बार जैसे ही कोई पत्रकार किसी विषय पर सवाल पूछता है, जवाब देने के बजाय पत्रकार की नीयत पर सवाल खड़े किए जाते हैं —
"आपको इससे क्या मतलब?"
"आप बार-बार सवाल क्यों पूछ रहे हैं?"
"आपको किसने शिकायत की?"
"आप खबर क्यों बना रहे हैं?"
लेकिन सवाल यह होना चाहिए कि जिस विषय पर सवाल पूछा जा रहा है, उसका वास्तविक तथ्य क्या है?
यदि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ है तो जवाब दिया जाना चाहिए। यदि कार्य पारदर्शी है तो दस्तावेज सामने रखे जाने चाहिए। यदि शिकायत गलत है तो तथ्य के साथ उसका खंडन किया जाना चाहिए।
पत्रकार से नाराज होने के बजाय सवाल का जवाब देना ही लोकतांत्रिक व्यवस्था की खूबसूरती है।
पत्रकार किसी का दुश्मन नहीं होता
पत्रकार किसी अधिकारी का दुश्मन नहीं, किसी जनप्रतिनिधि का दुश्मन नहीं, किसी विभाग का दुश्मन नहीं। उसका उद्देश्य है — सार्वजनिक हित से जुड़े विषयों को सामने लाना।
कलम की ताकत जिम्मेदारी के साथ आती है
कलम की ताकत के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी है। सवाल तथ्यों पर आधारित होना चाहिए।
एक जिम्मेदार पत्रकार कभी अफवाह को खबर नहीं बनाता, बिना तथ्य के किसी को दोषी नहीं ठहराता और व्यक्तिगत पसंद-नापसंद को खबर से अलग रखता है। उसकी असली पहचान उसकी निर्भीकता के साथ-साथ उसकी निष्पक्षता और विश्वसनीयता से होती है।
जनता के पैसे का हिसाब पूछना जरूरी है
सरकार और प्रशासन जनता के लिए काम करते हैं। विकास कार्यों में इस्तेमाल होने वाला पैसा जनता के करों से आता है। इसलिए सवाल पूछा जा सकता है —
सड़क किस एजेंसी ने बनाई? गुणवत्ता कैसी है? भुगतान किस आधार पर हुआ?
भवन की अनुमति क्या है? नक्शा स्वीकृत है या नहीं? नोटिस पर कार्रवाई क्या हुई?
ये सवाल किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं, व्यवस्था की पारदर्शिता के लिए होते हैं।
अधिकारी से सवाल करना अपमान नहीं
पत्रकार जब सवाल पूछता है तो उद्देश्य अपमान करना नहीं होता। अधिकारी जनता के लिए काम करता है और पत्रकार जनता से जुड़े सवाल लेकर उसके सामने जाता है। पद बड़ा हो सकता है, लेकिन जनहित से बड़ा कोई पद नहीं।
सवाल पूछने वाला पत्रकार दबाव में क्यों आए?
पत्रकारिता में राजनीतिक, प्रशासनिक, आर्थिक दबाव हमेशा रहा है। लेकिन यदि पत्रकार हर दबाव के सामने झुक जाए तो जनता की आवाज कौन उठाएगा? पत्रकार का काम सत्ता के सामने झुकना नहीं, बल्कि जनता के सामने जवाबदेह रहना है।
सवाल बंद होंगे तो जवाबदेही भी बंद होगी
जिस दिन समाज में सवाल पूछने की आदत खत्म हो जाएगी, उस दिन जवाबदेही भी कमजोर पड़ जाएगी। सवाल ही व्यवस्था को जगाते हैं, अधिकारियों को जवाब देने के लिए मजबूर करते हैं और लोकतंत्र को जीवंत रखते हैं।
मैं सवाल पूछता रहूंगा
हाँ, मैं एक पत्रकार हूँ। मैं सवाल पूछूंगा।
जहां जनता की समस्या होगी, वहां सवाल पूछूंगा।
जहां व्यवस्था में कमी दिखेगी, वहां सवाल पूछूंगा।
जहां जवाब जरूरी होगा, वहां जवाब मांगूंगा।
लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित करूंगा कि मेरे सवाल तथ्य पर आधारित हों, मेरी खबर निष्पक्ष हो और मेरी कलम किसी व्यक्तिगत स्वार्थ से प्रभावित न हो।
मैं किसी अधिकारी से व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं रखता। मेरा सवाल केवल उस व्यवस्था से है, जो जनता के प्रति जवाबदेह है।
अगर काम सही है तो जवाब दीजिए।
अगर आरोप गलत हैं तो तथ्य सामने रखिए।
अगर शिकायत निराधार है तो उसका खंडन कीजिए।
लेकिन सवाल पूछने वाले पत्रकार को चुप कराने की कोशिश मत कीजिए।
सवाल पूछना मेरा अधिकार है।
सवाल का जवाब देना व्यवस्था की जिम्मेदारी है।
और सच को जनता तक पहुंचाना मेरी पत्रकारिता की जिम्मेदारी है।
मैं पत्रकार हूँ…
मेरी कलम बिकेगी नहीं,
मेरी आवाज दबेगी नहीं,
और जनहित के सवाल रुकेंगे नहीं।
जब तक सवाल जिंदा हैं, तब तक लोकतंत्र जिंदा है।
और जब तक लोकतंत्र जिंदा है, पत्रकार की कलम चलती रहेगी।
— एक पत्रकार की कलम से

