गाजर घास के दुष्प्रभाव और नियंत्रण को लेकर कृषि विज्ञान केंद्र ने चलाया जागरूकता अभियान

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 किसानों एवं ग्रामीणों को गाजर घास की पहचान, स्वास्थ्य पर प्रभाव और प्रभावी नियंत्रण उपायों की दी जानकारी 
 साहिल खान 
शहडोल। कृषि विज्ञान केंद्र शहडोल द्वारा ग्राम कल्याणपुर में गाजर घास (पार्थेनियम) उन्मूलन एवं जागरूकता अभियान आयोजित किया गया। अभियान के दौरान किसानों एवं ग्रामीणों को गाजर घास के दुष्प्रभाव, इसकी पहचान तथा प्रभावी नियंत्रण के उपायों की जानकारी दी गई। ग्रामीणों से अपील की गई कि गाजर घास को फूल एवं बीज बनने से पहले ही जड़ सहित नष्ट कर इसके प्रसार पर प्रभावी रोक लगाएं।

कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. मृगेंद्र सिंह ने बताया कि राष्ट्रीय खरपतवार अनुसंधान निदेशालय, जबलपुर के मार्गदर्शन में देशभर के कृषि विज्ञान केंद्रों, विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों द्वारा 16 से 22 अगस्त 2026 तक गाजर घास उन्मूलन के लिए विशेष अभियान चलाया गया। उन्होंने बताया कि भारत में गाजर घास का प्रवेश वर्ष 1950-56 के दौरान अमेरिका से आयातित गेहूं के साथ हुआ था। वर्तमान में यह खरपतवार फसलों के साथ-साथ स्थानीय वनस्पतियों, पर्यावरण एवं जैव विविधता के लिए भी गंभीर चुनौती बन चुका है।

वैज्ञानिक डॉ. ब्रजकिशोर प्रजापति ने बताया कि गाजर घास का वैज्ञानिक नाम पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस है। इसे चटक चांदनी एवं कड़वी घास के नाम से भी जाना जाता है। यह खेतों, मेड़ों, गांव-कस्बों के आसपास, उद्यानों, वनों, सड़क किनारे, रेलवे ट्रैक, आवासीय क्षेत्रों तथा जल निकासी एवं सिंचाई नहरों के आसपास तेजी से फैलता है। एक पौधा करीब 10 हजार से 25 हजार तक सूक्ष्म बीज पैदा कर सकता है, जो हवा और पानी के माध्यम से आसानी से दूर-दूर तक फैल जाते हैं।

उन्होंने बताया कि गाजर घास के लगातार संपर्क में आने से मनुष्यों में डर्मेटाइटिस, खुजली, एक्जिमा, एलर्जी, बुखार, दमा एवं श्वसन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। वहीं इसके सेवन से दुधारू पशुओं में दूध का स्वाद कड़वा होना, खुजली, बाल झड़ना, लार गिरना, अतिसार तथा मुंह एवं आंतों में छाले जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। अधिक मात्रा में गाजर घास खाने से पशुओं की मृत्यु तक हो सकती है।

 फूल आने से पहले उन्मूलन सबसे प्रभावी 

डॉ. अल्पना शर्मा एवं डॉ. दीपक चौहान ने किसानों को बताया कि गाजर घास में मध्य अगस्त से मध्य सितंबर के बीच पुष्पण तेज होता है। ऐसे में फूल आने से पहले पौधों को जड़ सहित उखाड़कर नष्ट करना सबसे प्रभावी उपाय है। इससे पौधे बीज बनने से पहले ही समाप्त हो जाते हैं। उन्होंने गाजर घास उखाड़ते समय दस्ताने एवं सुरक्षात्मक कपड़ों का उपयोग करने की सलाह दी।

 जैविक एवं रासायनिक नियंत्रण की दी जानकारी 

तकनीकी अधिकारी डॉ. नितिन सिंघई एवं भागवत पन्द्रे ने गाजर घास के जैविक एवं रासायनिक नियंत्रण की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि बड़े क्षेत्र में फैली गाजर घास के जैविक नियंत्रण के लिए मैक्सिकन बीटल (जाइगोग्रामा बाइकलरेटा) उपयोगी है। आवश्यकता के अनुसार शाकनाशियों के माध्यम से भी इसका नियंत्रण किया जा सकता है। अकृषित क्षेत्रों में उपयुक्त परिस्थितियों के अनुसार ग्लाइफोसेट तथा गाजर घास नियंत्रण के लिए मेट्रिब्यूजिन के उपयोग की जानकारी भी किसानों को दी गई।

अभियान के अंत में कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों एवं ग्रामीणों से अपील की कि वे अपने खेतों, मेड़ों और आसपास के क्षेत्रों में गाजर घास की नियमित निगरानी करें तथा फूल और बीज बनने से पहले इसका उन्मूलन कर इसके प्रसार को रोकने में सक्रिय सहयोग दें।

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