सेवा की मिसाल: सेवानिवृत्त होते ही शिक्षिका सरोज बुआ ने बच्चों को दिया 30 हजार का तोहफा, स्कूल में लगवाया झूला

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बामौर कलां के चौकाखेड़ा स्कूल में भावुक विदाई, बीआरसीसी बोले- "ऐसे दान से ही संवरेंगे सरकारी स्कूल"  
अतुल जैन 
खनियांधाना।  सेवानिवृत्ति अक्सर विदाई का पल होती है, लेकिन जन शिक्षा केंद्र बामौर कलां के शासकीय प्राथमिक विद्यालय चौकाखेड़ा की वरिष्ठ शिक्षिका श्रीमती सरोज गुप्ता 'बुआ जी' ने इसे सेवा का उत्सव बना दिया। 38 साल तक शिक्षा की अलख जगाने वाली इस कर्तव्यनिष्ठ शिक्षिका ने रिटायरमेंट पर खुद उपहार लेने के बजाय विद्यालय के नन्हे-मुन्ने बच्चों को करीब 30 हजार रुपये की लागत का आकर्षक झूला भेंट कर दिया। सोमवार को झूला झुलाकर उन्हें भावभीनी विदाई दी गई।  

सेवानिवृत्ति समारोह को यादगार बनाने की पहल बुआ जी के भतीजे ने की। उन्होंने जन शिक्षक अनिल शर्मा के माध्यम से बीआरसीसी संजय भदौरिया से आग्रह किया कि विदाई ऐसी हो जो वर्षों तक याद रहे। भदौरिया ने सुझाव दिया कि बच्चों के लिए कोई स्थायी उपयोगी सामग्री भेंट की जाए, ताकि सेवानिवृत्ति के बाद भी शिक्षिका की सेवाएं जीवंत रहें। इस प्रेरणादायक सुझाव को श्रीमती सरोज गुप्ता ने तुरंत स्वीकार कर लिया और झूला लगवाने का संकल्प लिया।  

समारोह में संकुल प्राचार्य सुरेंद्र सिंह यादव, जन शिक्षा केंद्र प्रभारी मुकेश तिवारी, मुकेश पटेरिया, जगदीश महते, कीर्ति जैन, राजेश तिवारी, राजेश शर्मा, हरिकृष्ण स्वर्णकार, धनीराम जाटव, अनिल शर्मा समेत बड़ी संख्या में शिक्षक और गणमान्य नागरिक मौजूद रहे।  

बीआरसी संजय भदौरिया ने अपने उद्बोधन में कहा, "समाज के सकारात्मक सहयोग से ही सरकारी विद्यालयों का संचालन बेहतर हो सकता है। खनियांधाना में दानदाताओं का सहयोग लगातार मिल रहा है। सरोज बुआ का यह कदम पूरे समाज के लिए प्रेरणा है।" सभी वक्ताओं ने कहा कि एक शिक्षक की असली पहचान सेवा अवधि से नहीं, बल्कि समाज और विद्यार्थियों पर छोड़ी गई छाप से होती है।  
श्रीमती सरोज गुप्ता का यह कदम सरकारी स्कूलों के प्रति सामाजिक उत्तरदायित्व की बड़ी मिसाल बन गया है। झूला पाकर बच्चों के चेहरे खिल उठे। यह समारोह केवल विदाई नहीं, बल्कि 'सेवा ही सच्चा सम्मान है' का संदेश दे गया।

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