ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या : सत्य से साक्षात्कार सहजयोग
मानव जीवन केवल जन्म लेने, सांसारिक जिम्मेदारियाँ निभाने और सुख-सुविधाएँ प्राप्त करने के लिए नहीं है। हमारे जीवन का वास्तविक उद्देश्य है—अपने आपको जानना। सदियों से मनुष्य के भीतर एक प्रश्न उठता आया है—“मैं कौन हूँ?” इस प्रश्न का उत्तर ही हमारी आध्यात्मिक यात्रा का प्रारंभ है।
आद्य शंकराचार्य ने कहा—“ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या।” इसका अर्थ है कि परम सत्य ब्रह्म है, जबकि यह संसार परिवर्तनशील और क्षणभंगुर है। जिस परमपिता परमेश्वर की हम खोज बाहर करते हैं, उसी का अंश हमारे भीतर आत्मा के रूप में विद्यमान है। आत्मसाक्षात्कार उस आंतरिक सत्य को अनुभव करने का द्वार है।
किन्तु मनुष्य अपने दैनिक जीवन, परिवार, संबंधों, इच्छाओं और भौतिक उपलब्धियों में इतना उलझ जाता है कि अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है। इसी सत्य को समझाने वाली नारद मुनि की कथा अत्यंत सुंदर है।
नारद मुनि भगवान विष्णु के परम भक्त थे। वे सदैव “नारायण, नारायण” का जाप करते हुए तीनों लोकों में विचरण करते और लोगों को ईश्वरभक्ति का संदेश देते थे। एक दिन ब्रह्मदेव ने उनसे कहा—“तुम लोगों को गृहस्थ जीवन से दूर रहने का उपदेश देते हो, लेकिन क्या तुमने कभी गृहस्थ जीवन की माया और उसके बंधनों को अनुभव किया है?” नारदजी ने यह बात भगवान विष्णु को बताई। भगवान विष्णु मुस्कुराए और उन्हें एक तालाब से कमंडलु में जल लाने के लिए भेजा। तालाब के पास पहुँचकर नारदजी ने एक अद्भुत संसार देखा। वहाँ सुंदर महल, रमणीय उद्यान और एक अत्यंत सुंदर युवती थी। नारदजी उससे प्रभावित हुए, विवाह किया और देखते ही देखते गृहस्थ जीवन में पूरी तरह लीन हो गए। परिवार बढ़ा और वे अपने संसार में अत्यंत सुखी रहने लगे। एक दिन भयंकर तूफान आया। देखते ही देखते उनके पुत्र और पत्नी उनसे बिछड़ गए। दुःख से व्याकुल नारदजी एक वृक्ष को पकड़कर रोने लगे। उसी क्षण उन्हें अपने गुरु भगवान विष्णु की याद आई। तभी किसी ने उनके कंधे पर हाथ रखा। पीछे मुड़कर देखा तो भगवान विष्णु सामने खड़े थे। नारदजी ने आश्चर्य से देखा कि वे फिर उसी तालाब के किनारे खड़े हैं और उनके हाथ में वही खाली कमंडलु है। उन्हें समझ आया कि जो कुछ उन्होंने वर्षों तक अनुभव किया, वह भगवान की माया का केवल एक क्षण था। भगवान विष्णु ने कहा—“नारद, मेरी माया में तुम जैसे ज्ञानी भी इतने लीन हो गए, तो सामान्य मनुष्य की स्थिति क्या होगी?”
यह कथा हमें बताती है कि संसार में रहते हुए हमें अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं भूलना चाहिए। सुख-दुःख, संबंध, संपत्ति और परिस्थितियाँ सब परिवर्तनशील हैं। जीवन भी एक छोटे से स्वप्न की तरह है। वास्तविक और शाश्वत सत्य हमारे भीतर स्थित आत्मा है।
सहजयोग हमें इसी आंतरिक सत्य को अनुभव करने का मार्ग दिखाता है। आत्मसाक्षात्कार के माध्यम से हम अपने भीतर स्थित उस शांति, आनंद और परम सत्य को अनुभव कर सकते हैं, जिसकी खोज में मनुष्य जीवन भर बाहर भटकता रहता है।आइए, इस अमूल्य मानव जीवन को केवल संसार में खोने के बजाय अपने भीतर की यात्रा प्रारंभ करें।
सहज योग निशुल्क भी है और आसान भी सहजयोग ध्यान केंद्र की जानकारी टोल फ्री नंबर 1800 2700 800 अथवा www.sahajayoga.org.in से प्राप्त कर सकते हैं।

