समाज में बदलते रिश्ते और खत्म होता अपनापन
संपादकीय
रिश्ते कभी समाज की सबसे मजबूत नींव हुआ करते थे,
जहाँ नाम से पहले अपनापन बोला जाता था।
आज वही रिश्ते
औपचारिकताओं की फ़ाइल में बंद होते जा रहे हैं।
हम एक ऐसे दौर में खड़े हैं
जहाँ घर बड़े हो गए,
पर दिल सिकुड़ते चले गए।
जहाँ “मेरे अपने”
संपर्क सूची तक सीमित रह गए।
पहले दुख साझा होता था,
आज सिर्फ़ स्टेटस अपडेट होता है।
पहले हालचाल पूछा जाता था,
आज “Seen” ही जवाब बन गया है।
समाज ने प्रगति तो की,
पर संवेदनाएँ पीछे छूट गईं।
रिश्तों में समय नहीं रहा,
और बिना समय के
अपनापन ज़िंदा कैसे रहे?
माँ-बाप बोझ कहे जाने लगे,
भाई-बहन औपचारिक रिश्ते बन गए।
पड़ोसी अजनबी हो गए,
और दोस्त काम के हिसाब से चुने जाने लगे।
यह केवल रिश्तों का संकट नहीं है,
यह संवेदना का पतन है।
यह सवाल है हमारे ज़मीर से—
क्या हम इंसान हैं
या सिर्फ़ व्यस्त मशीन?
फिर भी उम्मीद पूरी तरह मरी नहीं है।
आज भी जब कोई
बिना स्वार्थ साथ खड़ा होता है,
तो लगता है—
इंसान अब भी ज़िंदा है।
ज़रूरत है
फिर से सुनने की,
फिर से समझने की,
और रिश्तों को
फिर से जीने की।
क्योंकि समाज
इमारतों से नहीं,
रिश्तों से बनता है।

संपादकीय
गोपाल गावंडे- कवि
(रणजीत टाइम्स)

