दतिया चुनाव, मोहन पर संकट और नरोत्तम का संन्यास...?
राजेश धाकड़
राजनीति बड़ी निर्मोही होती है। यहाँ कल तक जिसके दरबार में मंत्री, विधायक और अफसरों की कतार लगी रहती है, चुनाव परिणाम के अगले दिन वही नेता अपने पुराने भाषण सुनकर तसल्ली करता है कि कभी उसका भी समय था।
दतिया के उपचुनाव ने मध्यप्रदेश भाजपा को ऐसा ही आईना दिखाया है। यह सिर्फ एक सीट का परिणाम नहीं है, बल्कि सत्ता के गलियारों में गूंजती वह घंटी है जिसे अनसुना करना महँगा पड़ सकता है। जनता ने साफ संकेत दिया है कि सत्ता का अहंकार और संगठन की आत्मसंतुष्टि लोकतंत्र में ज्यादा दिन नहीं चलती।
दतिया कभी भाजपा का अभेद्य किला माना जाता था। यह वही दतिया है जहाँ नरोत्तम मिश्रा का नाम चुनावी पहचान हुआ करता था। लेकिन राजनीति में इतिहास नहीं, वर्तमान चलता है। 2018 का झटका, 2023 की हार और अब उपचुनाव का संदेश... जनता ने मानो कह दिया कि नेता चाहे कितना भी बड़ा हो, अंतिम फैसला जनता की उँगली ही करती है।
व्यंग्य में कहूँ तो अब दादा नरोत्तम मिश्रा को प्रेस कॉन्फ्रेंस से ज्यादा नवग्रह मंदिर की आरती में समय देना चाहिए। राजनीति का शोर बहुत सुन लिया, अब शायद ग्रह-नक्षत्रों की राय भी सुन लेनी चाहिए। हो सकता है शनि महाराज वह सलाह दे दें जो राजनीतिक सलाहकार वर्षों से नहीं दे पाए।
हालाँकि राजनीति में संन्यास की घोषणा करना आसान है, लेना कठिन। नेता राजनीति से उतनी ही आसानी से अलग नहीं होता, जितनी आसानी से मछली पानी छोड़ दे। इसलिए दादा कल फिर किसी मंच पर दिख जाएँ तो आश्चर्य मत कीजिएगा। राजनीति में "अलविदा" शब्द सबसे कम विश्वसनीय होता है। लेकिन असली परीक्षा अब मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की है।
मुख्यमंत्री बनने के बाद उनसे उम्मीद थी कि सरकार की रफ्तार बदलेगी, प्रशासन चुस्त होगा और संगठन को नई ऊर्जा मिलेगी। मगर हाल के चुनावी परिणाम बताते हैं कि तस्वीर उतनी चमकदार नहीं है जितनी सरकारी विज्ञापनों में दिखाई देती है।
सत्ता में बैठे लोगों की सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि उन्हें सच्चाई बताने वाले लोग धीरे-धीरे गायब होने लगते हैं। चारों तरफ केवल वही लोग बचते हैं जो हर निर्णय को ऐतिहासिक, हर भाषण को क्रांतिकारी और हर घोषणा को विश्वस्तरीय बता देते हैं। ऐसे माहौल में हार अचानक नहीं आती, धीरे-धीरे चलकर दरवाज़े तक पहुँचती है और फिर एक दिन चुनाव परिणाम बन जाती है।
राजनीति का पुराना नियम है मुख्यमंत्री की ताकत केवल उनकी कुर्सी नहीं, बल्कि उनकी प्रशासनिक पकड़ होती है। यदि फैसले ज़मीन पर असर नहीं छोड़ रहे, योजनाओं का लाभ जनता तक अपेक्षित रूप से नहीं पहुँच रहा और स्थानीय असंतोष बढ़ रहा है, तो चुनाव परिणाम सवाल खड़े करते हैं।
दतिया का संदेश केवल स्थानीय नहीं माना जाएगा। दिल्ली की राजनीति में हर उपचुनाव की फाइल अलग रंग से देखी जाती है। वहाँ यह नहीं पूछा जाता कि हार कितने वोटों से हुई, बल्कि यह पूछा जाता है कि हार क्यों हुई और जिम्मेदारी किसकी है।
सितंबर में यदि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व संगठन और सरकार की समीक्षा करता है तो उसमें दतिया का उल्लेख अवश्य होगा। क्योंकि लोकतंत्र में जनता की अदालत सबसे बड़ी अदालत होती है और उसके फैसले पर कोई पुनर्विचार याचिका नहीं लगती।
आज भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, आत्ममंथन है। यदि कार्यकर्ता निराश है, स्थानीय नेतृत्व असंतुष्ट है और जनता नाराज़ है, तो केवल बड़े आयोजन और प्रचार अभियान चुनाव नहीं जिता सकते।
राजनीति में सलाहकारों का महत्व भी कम नहीं होता। अच्छा सलाहकार वह नहीं जो हर समय "सब ठीक है" कहे, बल्कि वह जो समय रहते बता दे कि जनता नाराज़ है। दुर्भाग्य से कई नेता अपने आसपास ऐसे लोगों की भीड़ बना लेते हैं जो आईना नहीं, केवल ताली दिखाते हैं।
ताली की आवाज़ चुनाव तक सुनाई देती है, लेकिन ईवीएम का बटन दबते ही आईना सामने आ जाता है।
दतिया ने यही आईना दिखाया है।
अब देखना यह है कि भाजपा इस परिणाम को केवल एक उपचुनाव मानकर भूल जाती है या इसे 2028 की तैयारी का पहला चेतावनी संदेश मानती है।
जहाँ तक नरोत्तम मिश्रा का सवाल है, राजनीति में उनकी भूमिका क्या होगी, इसका निर्णय वे स्वयं और उनकी पार्टी करेगी। लेकिन जनता ने इतना जरूर बता दिया है कि कोई भी नेता जनता से बड़ा नहीं होता।
और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के लिए भी यह समय जश्न का नहीं, समीक्षा का है। क्योंकि लोकतंत्र में जनता पहले संकेत देती है, फिर चेतावनी देती है और अंत में फैसला सुनाती है। दतिया शायद पहला संकेत नहीं था, लेकिन इसे अंतिम चेतावनी मानना चाहिए।
बाकी, राजनीति में ग्रह भी बदलते हैं, सरकार भी बदलती है और नेताओं के तेवर भी। बस एक चीज़ नहीं बदलती जनता का फैसला।

