सत्ता से दूरी और भीतरघात: कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती बनी राज्यसभा की राह

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नई दिल्ली। राज्यसभा चुनावों में कांग्रेस के 11 विधायकों ने पार्टी के निर्देशों की अवहेलना की है। इस घटना ने एक बार फिर यह उजागर कर दिया है कि जब कांग्रेस विपक्ष में होती है, तो केंद्र और राज्य दोनों स्तरों के चुनाव उसकी सबसे बड़ी कमजोरी साबित होते हैं।
हरियाणा: कांग्रेस के 5 विधायकों ने पार्टी के खिलाफ जाकर वोट किया। इसके अलावा यहां 4 वोट अमान्य घोषित किए गए, जिसे कांग्रेस ने साजिश करार देते हुए आरोप लगाया है कि रिटर्निंग ऑफिसर ने भाजपा के एजेंट की तरह काम किया।
ओडिशा: यहां 3 विधायकों ने पार्टी लाइन से हटकर मतदान किया। जिससे कांग्रेस-बीजेडी समर्थक उम्मीदवार की हार हुई।
जिन राज्यों में कांग्रेस विपक्ष में है, वहां राज्यसभा और विधान परिषद चुनावों में बार-बार होने वाली यह बगावत या क्रॉस-वोटिंग मुख्य रूप से दो कारणों का नतीजा है: भाजपा के नेतृत्व वाले सत्ताधारी दलों का प्रभाव या फिर पार्टी के भीतर की गुटबाजी।
हालांकि, पिछले दो चुनाव हारने के बाद कांग्रेस इस बार हरियाणा में राज्यसभा चुनाव जीतने में कामयाब रही, लेकिन बिहार और ओडिशा में अपने सहयोगियों को फायदा पहुंचाने की उसकी कोशिशें बुरी तरह नाकाम रहीं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि राज्यों की सत्ता से भाजपा को बेदखल करने में कांग्रेस की विफलता इसका एक बड़ा कारण है। सत्ता में वापसी न कर पाने की वजह से पार्टी के चुने हुए विधायकों में काफी निराशा है, जिससे वे सत्ताधारी दल के लिए आसान शिकार बन जाते हैं। ओडिशा और बिहार में विधायकों की बगावत को इसी का परिणाम माना जा रहा है।
दूसरी ओर, हरियाणा में गुटबाजी ने बड़ी भूमिका निभाई है। इसका उदाहरण अतीत में भी देखने को मिला है, जब क्रॉस-वोटिंग करने वाले किरण चौधरी और कुलदीप बिश्नोई जैसे कांग्रेसी विधायक बाद में भाजपा में शामिल हो गए थे।
साभार लाइव हिन्दुस्तान 

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