सभी प्रकार की भक्ति में श्रेष्ठ है गुरु के अमृतवचनों का अनुसरण

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"मूल ध्यान गुरु रूप है, मूल पूजा गुरु पाँव।
मूल नाम गुरु वचन है, मूल सत्य सतभाव॥"
— संत कबीर
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में गुरु को केवल ज्ञानदाता नहीं, बल्कि आत्मज्ञान का मार्गदर्शक माना गया है। संतों और ऋषियों ने सदैव इस बात पर बल दिया है कि गुरु के मार्गदर्शन में किया गया ध्यान साधक को आत्मबोध और अंततः परम सत्य की अनुभूति तक पहुँचाता है। संत कबीर का उपरोक्त दोहा इसी सत्य को सरल शब्दों में अभिव्यक्त करता है।
   आज विज्ञान और तकनीक के युग में 'योग', 'ध्यान', 'आत्मसाक्षात्कार', 'निर्विचार समाधि' और 'कुंडलिनी जागरण' जैसे विषय अनेक लोगों को जटिल या कल्पनात्मक प्रतीत हो सकते हैं। किंतु भारतीय दर्शन इन अवधारणाओं को मानव चेतना के विकास की वास्तविक अवस्थाएँ मानता है। भगवद्गीता का का संदेश है—"श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्", अर्थात् श्रद्धा रखने वाला साधक ही ज्ञान की प्राप्ति करता है। आत्मज्ञान की यात्रा का आरंभ भी तब होता है, जब मनुष्य के भीतर यह प्रश्न जागता है—"मैं कौन हूँ? मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है?"
यही जिज्ञासा साधक को 'स्व' की खोज की ओर ले जाती है। जब आत्मसाक्षात्कार की शुद्ध इच्छा प्रबल होती है, तब गुरु की कृपा उसके आध्यात्मिक मार्ग को प्रकाशित करती है। सहजयोग में इसी गुरु-कृपा को आत्मिक जागरण का आधार माना गया है।
परम पूज्य श्री माताजी द्वारा स्थापित सहजयोग आत्मसाक्षात्कार और निर्विचार ध्यान का एक सरल एवं निःशुल्क मार्ग प्रस्तुत करता है। सहजयोग के अनुसार आत्मसाक्षात्कार के माध्यम से साधक अपने भीतर स्थित कुंडलिनी शक्ति के जागरण का अनुभव करता है, जिससे ध्यान अधिक गहन और सहज बनता है। नियमित साधना के साथ व्यक्ति के भीतर आत्मसंयम, विवेक और संतुलन विकसित होने लगता है तथा अनेक साधक अनुभव करते हैं कि उनके जीवन की नकारात्मक प्रवृत्तियाँ और व्यसन धीरे-धीरे कम होने लगते हैं।
सहजयोग में गुरु के वचनों को केवल उपदेश नहीं, बल्कि जीवन में उतारने योग्य आध्यात्मिक मार्गदर्शन माना जाता है। श्री माताजी ने अपने प्रवचनों में कहा है कि कुंडलिनी शक्ति साधक के भीतर गुरुत्व का विकास करती है। इसके फलस्वरूप व्यक्ति में सत्य और असत्य के बीच विवेक जागृत होता है तथा वह धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझने लगता है।
नियमित ध्यान और आत्मचिंतन से साधक का व्यक्तित्व भी परिवर्तित होने लगता है। उसके भीतर क्षमा, करुणा, निर्भयता, संतुलन और आत्मविश्वास जैसे गुण विकसित होते हैं। सहजयोग का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत आध्यात्मिक उन्नति नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्तित्वों का निर्माण करना है जो समाज में प्रेम, शांति और नैतिक मूल्यों का प्रसार कर सकें। यही 'ज्योति से ज्योति जलाने' की भारतीय परंपरा का वास्तविक स्वरूप है।
सहजयोग पूर्णतः निःशुल्क है। इच्छुक व्यक्ति सहजयोग एवं आत्मसाक्षात्कार के बारे में अधिक जानकारी टोल-फ्री नंबर 1800 2700 800  अथवा वेबसाइट sahajayoga.org.in से प्राप्त कर सकते हैं।

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