घंटाघर हनुमान मंदिर के सामने शराब दुकान हटाने की मांग हिंदू परिषद बजरंग दल ने किया कलेक्ट्रेट गेटमें जोरदार प्रदर्शन
आबकारी विभाग शराब ठेकेदारों के सामने किया समर्पण
कटनी से जिला ब्यूरो नवल किशोर कुशवाहा
कटनी।शहर के घंटाघर स्थित हनुमान मंदिर के ठीक सामने संचालित शराब ठेके को लेकर जनआक्रोश विश्व हिंदू परिषद बजरंग दल इकाई जिला कटनी के बैनर तले सैकड़ों कार्यकर्ता ने गुरुवार को सड़कों पर उतर आए और कलेक्ट्रेट कार्यालय के मुख्य द्वार पर चक्का जाम कर जोरदार शक्ति प्रदर्शन किया। पूरे क्षेत्र में मंदिर के सामने मदिरा नहीं चलेगी और आबकारी विभाग होश में आओ जैसे नारों की गूंज सुनाई दी।
प्रदर्शन केवल विरोध नहीं, बल्कि एक स्पष्ट चेतावनी के रूप में सामने आया। कार्यकर्ताओं ने दो टूक कहा कि आस्था के केंद्र के सामने शराब ठेका किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उनका आरोप है कि प्रशासन जानबूझकर इस गंभीर मुद्दे को नजरअंदाज कर रहा है, जिससे जनता की धार्मिक भावनाएं आहत हो रही हैं।
विहिप के नेताओं और पदाधिकारियों ने कहा कि यह सिर्फ एक ठेका हटाने की मांग नहीं, बल्कि संस्कार और आस्था की रक्षा का आंदोलन है। बजरंग दल कार्यकर्ताओं ने भी आक्रोश जताते हुए स्पष्ट कर दिया कि यदि जल्द निर्णय नहीं लिया गया, तो यह आंदोलन और व्यापक तथा उग्र रूप लेगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी प्रशासन की होगी।
चक्का जाम के चलते कुछ समय के लिए शहर की यातायात व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई। हालांकि मौके पर तैनात पुलिस और ट्रैफिक बल ने स्थिति को नियंत्रित रखा और बाद में यातायात बहाल कराया, लेकिन प्रदर्शनकारियों के तेवर पूरे समय आक्रामक बना रहा।
प्रदर्शन के दौरान एक ही स्वर गूंजता रहा मंदिर की मर्यादा से समझौता नहीं। संगठनों ने प्रशासन को अल्टीमेटम देते हुए मांग की है कि घंटाघर स्थित हनुमान मंदिर के सामने से शराब ठेका तत्काल हटाया जाए, अन्यथा आंदोलन को जिलेभर में फैलाया जाएगा। इस पूरे घटनाक्रम ने साफ कर दिया है कि यह मुद्दा अब केवल एक स्थान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जनभावनाओं से जुड़ा बड़ा आंदोलन बन चुका है। अब सबकी नजरें जिला प्रशासन पर टिकी हैं क्या वह आस्था के इस उफान के आगे झुकेगा या फिर टकराव की स्थिति और गहराएगी। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि जनभावनाओं की अनदेखी लंबे समय तक संभव नहीं होती। प्रशासन के लिए यह एक परीक्षा की घड़ी है जहां उसे कानून, व्यवस्था और सामाजिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन बनाते हुए निर्णय लेना होगा। वहीं, समाज के विभिन्न संगठनों की जिम्मेदारी भी है कि वे अपनी बात शांतिपूर्ण और संवाद के माध्यम से रखें। समाधान टकराव में नहीं, बल्कि समझ और संतुलन में छिपा है ताकि शहर की शांति, आस्था और व्यवस्था तीनों सुरक्षित रह सकें।

