होली चैतन्य के रंग में सराबोर होने का पर्व

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विभिन्न रंगों की ऊर्जा आध्यात्मिक चेतना के विभिन्न स्तरों को प्रभावित करती है।
होली रंगों का, स्नेह का, दोस्ती का त्योहार है।  पुराने सारे बैर मिटाकर वातावरण में आपसी सद्भावना का संचार करना ही होली मनाने का उद्देश्य है।   
सहजयोग‌ प्रणेता और हमारी परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी होली पर जो प्रवचन दिया था, उसके आधार पर, " कुंडलिनी के माध्यम से साधक विराट द्वारा निर्मित अपने शरीर में स्नेह का संचार करते हैं जिससे हमारा शरीर चैतन्य की अनुभूति पाता है।  रंग सभी चक्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं।  हर चक्र का अलग रंग है।  चैतन्य के माध्यम से हमारे अंदर स्थित चक्रों का रंग पूरे वायु में स्नेह रुप में प्रवाहित होने लगता है, हम इस प्रवाह के माध्यम बन जाते हैं।  जब हम किसी को रंग लगाते हैं तब हमारे साथ उस रंग से जुड़ा उसका चक्र भी आशीर्वादित होता है।   जब हम किसी को लाल रंग लगाते हैं तब अनजाने में ही हमारी यह भावना होती है कि वह लाल रंग  से पूर्णतया रंग जाये।   लाल रंग मूलाधार का चक्र है और अबोधिता का द्योतक है।
होली का आध्यात्मिक तथ्य श्री माताजी के प्रवचन के सारांश से स्पष्ट होता है।  रंगों की सुगंध और मिठाई की खुशबू इस त्योहार को रंगीन और मीठा बनाती है। 
योग ज्ञान के आधार पर अबोधिता गुण वाले मूलाधार चक्र (जड़ चक्र)का रंग लाल, सृजनात्मकता वाले चक्र स्वाधिष्ठान का पीला, संतुष्टि प्रदान करने वाले नाभी का रंग हरा, निर्भयता व आत्मविश्वास देने वाले हृदय चक्र का रंग माणिक लाल, साक्षी भाव प्रदान करने वाले विशुद्धि का रंग नीला, क्षमाशीलता के गुण वाले आज्ञा चक्र का रंग सफेद और सदाशिव के आसन सहस्त्रार का रंग इंद्रधनुषी  है।  अपने प्रियजनों और मित्रों को रंग लगाते समय सहज योगी साधक  की सार्थकता सभी को मिले, यही हमारी परमपूज्य श्री माताजी से प्रार्थना है।  होली की कथा यह है कि होलिका की मृत्यु के सुख, संतुष्टि और शांति से आल्हादित लोगों ने एक दूसरे पर होलिका दहन की राख मलकर होली मनाई थी।   
कथा यह भी है कि कामदेव ने शिव पर अपने पुष्प बाण से प्रहार किया, जिससे शिव की समाधि भंग हो गयी. क्रुद्ध होकर, शिव ने अपना तीसरा नेत्र खोलकर कामदेव को भस्म कर दिया. बाद में, देवताओं ने शिव को पार्वती से विवाह के लिए राजी किया. इस घटना को याद करते हुए, फाल्गुन पूर्णिमा को होली के रूप में मनाया जाता है। 
 पौराणिक कथाओं के मुताबिक, ब्रज में सबसे पहले होली श्रीकृष्ण और राधा ने खेली थी. कहा जाता है कि श्रीकृष्ण ने ही अपने ग्वालों के साथ होली खेलने की शुरुआत की थी। होली की शुरुआत पर चाहे कितनी भी कहानी हो, उद्देश्य बेहद सुखद है क्योंकि जीवन में रंगों का महत्व बहुत गहरा होता है, रंग ऊर्जा, भावनाओं और आध्यात्मिक चेतना को प्रभावित करते हैं। विभिन्न रंग विभिन्न ऊर्जाओं और गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो योग अभ्यास और साधना के लिए तो उपयोगी है ही, बडी़ सार्थकता के साथ हमारे त्योहारों से भी जुड़े हैं। 
सहज योग को गहनता से समझने, जुड़ने और आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करने हेतु अपने नज़दीकी सहजयोग ध्यान केंद्र की जानकारी टोल फ्री नंबर 1800 2700 800 से प्राप्त कर सकते हैं ।

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