काश… बड़ा न होना पड़ता
माहि नरेंद्र राय
समझ ही नहीं आता…
कि बड़ा क्यों होना पड़ता है…
काश… कि न होना पड़ता…
कभी-कभी ना…
बस मन करता है वापस छोटी सी बच्ची बन जाऊँ…
जहाँ सब कुछ इतना मुश्किल नहीं लगता था…
जहाँ डर सिर्फ इतना होता था कि…
मम्मा का पल्लू कहीं भीड़ में छूट न जाए…
और आज?
आज तो हर जगह अकेले जाना पड़ता है…
पहले दादी-दादू के साथ हँसी आती थी…
नानू-नानी के घर जाकर लगता था दुनिया कितनी प्यारी है…
पापा की गोदी में बैठकर लगता था…
कि मुझे कभी कुछ हो ही नहीं सकता…
लेकिन फिर… पता ही नहीं चला…
कब कंधे भारी लगने लगे…
कब आँसू छुपाना सीख लिया…
कब “मैं ठीक हूँ”
सबसे बड़ा झूठ बन गया…
अब सुबह भी अजीब सी होती है…
ना कोई उठाता है प्यार से…
ना कोई कहता है, “ध्यान से जाना बेटा…”
बस खुद ही खुद को धक्का देना पड़ता है…
कि उठ, माही…
तू बड़ी हो गई है…
और सच बताऊँ?
मुझे ना अभी भी प्यार से बुलाया जाए तो अच्छा लगता है…
अभी भी कोई सर पर हाथ फेर दे…
तो रोना आ जाता है…
अभी भी गरम घी वाली रोटी…
दुनिया की सबसे स्पेशल चीज़ लगती है…
शरीर से बड़ी हो गई हूँ…
पर दिल?
दिल अभी भी बच्चा है…
और शायद इसी लिए…
रात को सबके सो जाने के बाद…
मैं चुपके से टूट जाती हूँ…
फिर भी…
हर रोज़ उठती हूँ…
हर रोज़ मुस्कुराती हूँ…
ये सोच के…
कि शायद एक दिन…
सब ठीक हो जाएगा…
लेकिन अभी के लिए…
बस इतना ही कहना है…
“समझ ही नहीं आता…
कि बड़ा क्यों होना पड़ता है…
काश… कि न होना पड़ता…”

