ग्रामीण पत्रकारिता में पहचान का संकट और चुनौतियां
राजेश सोनी उत्सव सोनी
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वर्तमान समय में जो वातावरण बन चुका है उसमें ग्रामीण पत्रकारों के समक्ष अपने आपको प्रांसगिक बनाए रखने की भारी भरकम चुनौती उपस्थित हो गई है।
राज़, समाज और सत्ता सब जगह शक्ति संतुलन का सिद्धान्त काम करता है यानी सीधे तौर पर जो जितना ताकतवर होगा वह उतना आगे जायेगा। और कमोवेश नेताओ, पत्रकारों और अधिकारियों के बीच प्रतिस्पर्धा चलती रहती है। कोशिश की जाती है कि इन तीनों खेमो की ओर से कोशिश की जाती है वे अपने प्रतिस्पर्धी से आगे निकले और आगे निकलने का मतलब यह है कि पूरी व्यवस्था में कौन अधिक प्रभावशाली सिद्ध होता है। पत्रकारों के साथ समस्या यह है कि उन्हें किसी भी तरह की संवैधानिक बढत प्राप्त नहीं है। ऐसे में पत्रकारों और पत्रकारिता को जो भी कुछ करना है वह अपनी प्रतिभा, मेहनत और साहस के दम पर करना है।
कॉर्पोरेट दौर में पत्रकारिता के समक्ष कई तरह की चुनौतियां उपस्थित हुई है, और ये चुनौतियां ग्रामीण पत्रकारिता के समक्ष अधिक गंभीर रूप में दिखाई पडने लगी है अपने काम के प्रति प्रतिबद्वता की बात करे तो ग्रामीण पत्रकार हमेशा ही बेहद संजीदा रहा है। जो सुविधाएं और अनुकूलता शहरी या संस्थागत पत्रकारों को प्राप्त होती है उनके बारे में ग्रामीण पत्रकार सोच भी नहीं सकता। वास्तव में ग्रामीण पत्रकार पाठक और खबर के बीच की वो कडी है जो बिना किसी प्राप्ति की आकांक्षा के सदैव सकिय रहती हैं। ग्रामीण पत्रकार लोकतंत्र की मशीन का बहुत प्रभावी और अनिवार्य कलपुर्जा है। सही मायने में ग्रामीण पत्रकार ही अपनी पूरी प्रतिबद्धता के साथ लोकतान्त्रिक मूल्यों को सिंचता है। इसे दुर्भाग्य के अलावा और कहेगें कि ग्रामीण पत्रकार बहुत तरह की विपरीत स्थितियों में भी संवाद प्रेपण का काम निष्ठा से करता तो है परन्तु उसके हिस्से कुछ नहीं आता।
आम आदमीजन अपनी समस्याओं के हल के लिए जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की चौखट से निराश होकर लौट जाता है, पर पत्रकार ही उसके लिए सम्बल बनकर उभरता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जितने महत्वपूर्ण व्यवस्थापिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका है उसके कम महत्व पत्रकारिता का नहीं है। हालांकि पत्रकारिता को कोई संवैधानिक अधिकार या मान्यता प्राप्त नहीं है, उसे जो प्राप्त है वह है जनमान्यता और पाठकों/ दर्शकों का विश्वास। जो दुर्भाग्य से अब टीआरपी, प्रसार संख्या और क्लिक वजन में बदलता जा रहा है।
समाज में व्याप्त बुराईयों के पैरोकार अपने हित साधने के लिए गाहे-बगाहे पत्रकारिता को निशाना बनाते है। ग्रामीण क्षेत्रों में माफिया और समाजविरोधी तत्व निरपेक्ष ग्रामीण पत्रकारिता को अपने अस्तित्व के लिए खतरा समझते है। और यही कारण है कि ग्रामीण क्षेत्रों से पत्रकारों के उत्पीडन की खबरे अब ज्यादा दिखाई सुनाई पडने लगी है। व्यवस्था के दूसरे अंग इस परिस्थिति में भी अपना फायदा ढूंढते है, पुलिस नेता और जनप्रतिनिधि घटना में न्यायपरक ढंग से कुछ करने को तैयार नहीं होते। यह स्थिति इसलिए निर्मित होती है कि सभी को अपने हितों की चिंता करनी होती है और पत्रकारों की कलम उन्हें इस काम में बाधा उपस्थित करती जान पडती है। वरना क्या कारण है कि रेत माफिया, भू माफिया, शराब माफिया, शिक्षा माफिया, स्वास्थ्य माफिया इन सबके लिए सही और सच्चा लिखने वाला पत्रकार आंख की किरकिरी बन जाता है।
अब सवाल यह है कि ग्रामीण पत्रकारिता के लिए ऑक्सीजन कहां से उपलब्ध हो मीडिया घरानों को अपने राजस्व की चिंता है। कई अखबार प्रबंधक और मालिक तो ग्रामीण पत्रकारों को मानसेवी संवाददाता पहचान तक देने में हिचकते है। ऐसे में खबरों के युद्ध क्षेत्र में ग्रामीण पत्रकारों को बिना ढाल और बिना सिरस्ताण के ही जाना पडता है। लेकिन कर्तव्य से प्रेरित ग्रामीण पत्रकार यह जोखिम लेने के लिए भी हर समय तत्पर रहता है। ग्रामीण पत्रकारिता के लिए इन दिनों सबसे जरूरी यह है कि ग्रामीण पत्रकार और छोटे-छोटे ग्रामीण पत्रकारिता के संगठन अपने-आपसी मतभेद परे रख कर एकजुट हो । भारत में जिस तरह वकील बिरादरी में एकता का रक्त संचार है, कुछ वैसा ही ग्रामीण पत्रकारों में होना चाहिए। वरना तो सारी शक्तियां ही कभी ना कभी हुए अपने नुकसान के चलते ग्रामीण पत्रकारों के प्रति बदले की भावना से भरी हुई है।
दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि समाज के अन्य वर्गों को भी यह समझना होगा कि ग्रामीण पत्रकार करंज का वह पेड है जो आपाठ की दुपहरी में भी घनी छाव देता है उसके फल भले मीठे ना लगते हो लेकिन उसके बीजों से निकलने वाला कडवा तेल कीटाणुनाशक औपधि का काम करता है। बालगंगाधर तिलक से लेकर गणेश शंकर विद्यार्थी और मामा बालेश्वर दयाल दीक्षित से लेकर डॉ. वेद प्रताप वैदिक तक सभी ने अपने पत्रकारीय कर्म से यही प्रतिबाधित किया है।

