एशियन वाटरबर्ड सेंसस 2026 के लिए इंदौर तैयार, वैज्ञानिक योजना और नागरिक सहभागिता पर ज़ोर
आदित्य शर्मा
इंदौर वन मंडल ने एशियन वाटरबर्ड सेंसस (AWC) 2026 की सभी तैयारियाँ पूरी कर ली हैं। यह गणना 3 और 4 जनवरी 2026 को होगी। इस बार सर्वेक्षण में वैज्ञानिक तरीकों, बेहतर मैदानी समन्वय और नागरिक सहभागिता पर विशेष ध्यान दिया गया है।
इन तैयारियों के तहत 2 जनवरी 2026 को इंदौर के वन मंडल कार्यालय में एक कार्यशाला आयोजित की गई, जिसमें वन विभाग के कर्मचारियों और पक्षी प्रेमियों को सर्वेक्षण की प्रक्रिया, आर्द्रभूमि (वेटलैंड) का आकलन और डिजिटल माध्यम से डेटा दर्ज करने की जानकारी दी गई।
क्या है एशियन वाटरबर्ड सेंसस
एशियन वाटरबर्ड सेंसस एक अंतरराष्ट्रीय नागरिक-विज्ञान कार्यक्रम है, जो हर साल एशिया और ऑस्ट्रेलिया के कई देशों में किया जाता है। भारत में यह कार्यक्रम आर्द्रभूमियों की निगरानी के लिए बहुत महत्वपूर्ण है और रामसर कन्वेंशन के तहत देश की अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियों को पूरा करने में मदद करता है।
राज्य स्तर से जिला स्तर तक तैयारी
19 दिसंबर को मध्य प्रदेश वन विभाग द्वारा राज्य स्तर पर एशियन वाटरबर्ड सेंसस 2026 के दिशा-निर्देश जारी किए गए थे। इसके बाद इंदौर वन मंडल ने इन्हें ज़मीनी स्तर पर लागू करने के लिए यह कार्यशाला आयोजित की।
इस कार्यशाला में उप वन मंडल अधिकारी, रेंज अधिकारी, डिप्टी रेंजर, वन रक्षक और प्रशिक्षित पक्षी विशेषज्ञ शामिल हुए। उन्हें पक्षियों की पहचान, गिनती की सही विधि, आर्द्रभूमि की स्थिति का आकलन और मोबाइल ऐप के उपयोग की जानकारी दी गई, ताकि सभी जगह एक जैसी और सही जानकारी जुटाई जा सके।
इंदौर जिले में 20 से अधिक वेटलैंड चिन्हित
पिछले रिकॉर्ड और हालिया निरीक्षण के आधार पर इंदौर जिले में 20 से अधिक झीलों, तालाबों, जलाशयों और नदी किनारे के क्षेत्रों को सर्वेक्षण के लिए चुना गया है। इन क्षेत्रों में स्थानीय और प्रवासी दोनों तरह के जल पक्षी पाए जाते हैं।
इस सर्वे में 50 से अधिक प्रशिक्षित पक्षी प्रेमी वन विभाग के कर्मचारियों के साथ भाग लेंगे। हर टीम को तय स्थान दिए गए हैं, ताकि दोहराव न हो और डेटा सही रहे।
ई-बर्ड ऐप का उपयोग
सर्वे के दौरान सभी पक्षियों की जानकारी eBird ऐप पर दर्ज की जाएगी। इससे हर रिकॉर्ड स्थान, समय और तारीख के साथ सुरक्षित होगा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तुलना के लिए उपयोगी बनेगा।
इसके साथ ही आर्द्रभूमि मूल्यांकन फॉर्म भी भरा जाएगा, जिसमें पानी की स्थिति, वनस्पति, मानवीय गतिविधियाँ और अन्य दबावों की जानकारी दर्ज की जाएगी। इससे पक्षियों की संख्या को पर्यावरण की स्थिति के साथ जोड़कर समझा जा सकेगा।
वेटलैंड और पक्षी: पर्यावरण के संकेतक
जल पक्षी आर्द्रभूमि की सेहत के अच्छे संकेतक माने जाते हैं। यदि पक्षियों की संख्या या विविधता घटती है, तो यह पानी की गुणवत्ता, आवास या मानवीय दबाव में बदलाव का संकेत हो सकता है।
इंदौर के आसपास कुछ वेटलैंड में हाल के वर्षों में जलकुंभी, प्रदूषण और मानवीय गतिविधियों के कारण दबाव बढ़ा है। सिरपुर झील में भी पहले की तुलना में खुले पानी का क्षेत्र कम हुआ है। ऐसे बदलाव बताते हैं कि नियमित निगरानी कितनी ज़रूरी है।
मध्य प्रदेश के बेहतर तैयार जिलों में इंदौर
समय पर योजना, बेहतर समन्वय और नागरिक सहभागिता के कारण इंदौर एशियन वाटरबर्ड सेंसस 2026 के लिए मध्य प्रदेश के बेहतर तैयार जिलों में शामिल है। यहां डेटा की गुणवत्ता और समय पर रिपोर्टिंग पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
इंदौर क्षेत्र में आम तौर पर कूट, भारतीय रॉबिन, दयाल, रोज़-रिंग्ड तोता, अलेक्ज़ेंडर तोता, धूसर हॉर्नबिल, किंगफिशर और ब्लैक-विंग्ड स्टिल्ट जैसे पक्षी देखे जाते हैं।
जिले में व्यापक पक्षी सर्वे की योजना
एशियन वाटरबर्ड सेंसस के बाद इंदौर जिले में एक व्यापक पक्षी सर्वे करने का भी प्रस्ताव है। इसका उद्देश्य अलग-अलग मौसम और आवासों में पक्षियों की स्थिति दर्ज कर एक स्थायी आधार तैयार करना है, जिससे भविष्य की संरक्षण योजनाओं में मदद मिल सके।
वन अधिकारियों ने बताया कि शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में आर्द्रभूमि संरक्षण न केवल पक्षियों के लिए बल्कि बाढ़ नियंत्रण और भूजल रिचार्ज जैसी सेवाओं के लिए भी जरूरी है।
स्थानीय प्रयास, वैश्विक जिम्मेदारी
भारत में इस समय 96 रामसर स्थल हैं, लेकिन छोटे वेटलैंड भी स्थानीय स्तर पर बहुत महत्वपूर्ण हैं। एशियन वाटरबर्ड सेंसस जैसे कार्यक्रम स्थानीय स्तर पर लोगों को जोड़कर वैश्विक संरक्षण लक्ष्यों को मजबूत करते हैं।
इंदौर वन मंडल की यह पहल विज्ञान आधारित संरक्षण, प्रशासनिक समन्वय और जनभागीदारी के माध्यम से दीर्घकालीन आर्द्रभूमि संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
प्रदीप मिश्रा, भा.व.से.
वन मंडलाधिकारी, इंदौर

