स्वच्छता में सिरमौर इंदौर, क्या ‘नर्मदा’ के प्रति अपनी जिम्मेदारी भूल रहा है?
विशेष संपादकीय
इंदौर। स्वच्छता के आसमान पर लगातार सात बार सात-सितारा कामयाबी का परचम लहराने वाला इंदौर आज एक गंभीर अंतर्विरोध के मुहाने पर खड़ा है। एक ओर शहर की सड़कों को चमकाने के लिए दिन-रात मेहनत की जाती है, वहीं दूसरी ओर हमारी रगों में दौड़ने वाली ‘नर्मदा’ के प्रति बढ़ती उदासीनता चिंता का विषय बनती जा रही है।
करोड़ों लीटर पानी की बर्बादी और स्थानीय जल स्रोतों की अनदेखी यह सवाल खड़ा करती है कि क्या हम अपनी जीवनरेखा नर्मदा को केवल एक सप्लाई लाइन मानकर संतुष्ट हो गए हैं?
पंपिंग स्टेशन से नल तक: लापरवाही की भारी कीमत
इंदौर की प्यास बुझाने के लिए नर्मदा का जल विंध्याचल की पहाड़ियों को पार कर लगभग 70 किलोमीटर दूर जलौद से लाया जाता है। शहर की ऊँचाई तक इस जल को पहुँचाने में नगर निगम को हर महीने करोड़ों रुपये बिजली पर खर्च करने पड़ते हैं।
इसके बावजूद शहर के कई इलाकों में सुबह-सुबह गाड़ियाँ धोने, पाइप से सड़कें बहाने और टंकियों का ओवरफ्लो होना आम दृश्य बन चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि जिस ‘नर्मदा मैया’ की हम पूजा करते हैं, उसी का इस तरह अपमान हमारी दोहरी मानसिकता को उजागर करता है।
उदासीनता के तीन खतरनाक संकेत
1. सहायक नदियों का दम घोंटना
कान्ह और सरस्वती नदियाँ कभी नर्मदा के पारिस्थितिकी तंत्र की रीढ़ थीं। आज वे गंदे नालों में तब्दील हो चुकी हैं। स्थानीय जल स्रोतों के नष्ट होने से इंदौर की नर्मदा पर निर्भरता 90 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है।
2. गिरता भूजल स्तर
कंक्रीट के बढ़ते जंगल ने ज़मीन की साँस रोक दी है। रेन वॉटर हार्वेस्टिंग महज़ कागज़ी औपचारिकता बनकर रह गई है, जिससे पूरा दबाव नर्मदा पर आ गया है।
3. धार्मिक पर्यटन और प्रदूषण
महेश्वर और ओंकारेश्वर जैसे पवित्र तटों पर इंदौर से जाने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों की संख्या तो बढ़ी है, लेकिन प्लास्टिक और कचरा छोड़ आना हमारी संवेदनहीनता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
क्या कहते हैं जानकार?
पर्यावरणविदों का स्पष्ट मानना है कि यदि इंदौर ने समय रहते जल-साक्षरता (Water Literacy) को नहीं अपनाया, तो स्वच्छता के तमगे प्यास की सच्चाई के सामने फीके पड़ जाएंगे। नर्मदा का जलस्तर हर वर्ष घट रहा है और यदि यही स्थिति रही, तो आने वाली पीढ़ियों को हम केवल सूखी पाइपलाइन सौंपेंगे।
अब भी वक्त है संभलने का
इंदौर ने यह सिद्ध किया है कि वह जन-भागीदारी से असंभव को संभव बना सकता है। अब वही संकल्प नर्मदा संरक्षण के लिए दिखाने की आवश्यकता है—
नल की टोंटी बंद करने से लेकर,
कान्ह-सरस्वती को पुनर्जीवित करने तक,
और धार्मिक स्थलों पर स्वच्छता अपनाने तक—
हर कदम निर्णायक साबित होगा।

