सहजयोग से जानें भ्रांति अर्थात् देवी के एक दिव्य स्वरूप का रहस्य

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‘‘या देवी सर्वभुतेषु भ्रांति रूपेण संस्थिता|
नमसतस्यै नमतस्यै नमो नमा: || ’’
परमपूज्य श्री माताजी प्रणित सहजयोग, अपने हृदयस्थित जगदंबा के जागरण की एक मधुर बेला है, मधुर अनुभूति है । जब सहजयोग में साधक को आत्मसाक्षात्कार प्राप्त होता है तब उसके पिंड मे स्थित स्पंदनशक्ति का वो अपने तालुभाग पर प्रथम बार अनुभव करता है। इस अनुभव को कबीरदासजी ने ‘शून्य शिखर’ पर अनहद बाजे ’ ऐसा वर्णित किया हुुआ है । सहजयोग त्रिवेणी संगम है, अर्थात जब साधक को आत्मसाक्षात्कार प्राप्त होता है तो उसे श्री महाकाली, श्री महासरस्वती और श्री महलक्ष्मी इन तीनों देवियों के आशीर्वाद प्राप्त होते हैं ।
जिस किसी साधक के जीवन को सहजयोग का स्पर्श होता है, उसका जीवन सुवर्णमयी बन जाता है, सहजानंद का यह अमृतमयी अनुभव उसके अंग प्रत्यंग में ही नहीं, अपितु उसके हर कार्य में झलकता है।
परंतु आत्मसाक्षात्कार पाना और इसमें स्थित होना, क्या इतना सरल है ? कंठोपनिषद कहता है,*
  ‘न अयम आत्मा बलहिनेन लभ्यो’
 अर्थात् जिनके पास आत्मिक बल नहीं है, शुध्द इच्छा शक्ति नहीं है, विरक्ति और तपस्विता नहीं है उन्हें आत्मा का ज्ञान नहीं प्राप्त हो सकता। परमपूज्य श्री माताजी 11 जुलाई 1993 को दिये गये अपने अमृतवचन मे कहतीं हैं कि, श्री महाकाली की शक्ति आपको शुद्ध इच्छाशक्ति प्रदान करती है और जब कोई भी साधक अपने दोनों हाथ फैलाकर श्री माताजी की प्रतिमा के सामने बैठकर, शुद्ध अंत:करण से आत्मसाक्षात्कार का दान मांगेगा तो वह दान उसे तत्क्षण प्राप्त हो जाता है, उस वक्त एक क्षण के लिये तो वो निर्विचारिता का निरानंद प्राप्त करता है, परंतु इस अनुभव में स्थित और स्थिर होने के लिये उसमें तपस्विता, अनुशासन और ध्यास होना चाहिये । अर्थात् अपने अध्यात्मिक यात्रा पर अग्रसर होने के लिये वह महाकाली की शक्ति उस साधक का हर समय मार्गदर्शन करती है । आप इस अनुभूति का महत्व समझें, इस अनुभव को अपने हृदय मे आप सदा के लिये स्थापित करें इसलिये वो शक्ति आपमें भ्रम पैदा करती है। भ्रम अर्थात भ्रांति । साधक अपने मार्ग से हट जाये ऐसा वातावरण, परिस्थिति या समस्यायें निर्माण करती है, उस वक्त साधक के बुद्धि की ,श्रध्दा और विश्‍वास की, और संवेदनशीलता की परीक्षा होती है। तब उस परिस्थिति में आप समझ जाते हैं कि क्या गलत है और क्या सही है। भ्रांति भी उस देवी का एक स्वरूप है जो आज्ञा चक्र से प्रवेश करती है और हमारे अहंकार को पोषित करती है। यही अहंकार भौतिक, मानसिक दैहिक आदि अनेक भ्रमों के लिये जिम्मेदार है, जिनके पीछे हम भागते हैं। परंतु एक बार जब हम अपने भीतर संतुष्ट हो जाते हैं, तो सभी भ्रम समाप्त हो जाते हैं। यही संतुष्टि प्रदान करने में श्री महाकाली की शक्ति हमारी सहायता करती है। वह परमपिता परमात्मा और उनकी शक्ति ‘आदिशक्ति’ करूणानिधान है, दयालु है, इसलिये उन्होंने इस भ्रम का सृजन किया ताकि मनुष्य अपने अहंकार से बाहर निकल कर परमात्मा के अस्तित्व का साक्षात्कार कर सके।
अपने नज़दीकी सहज योग ध्यान केंद्र की जानकारी टोल-फ्री नंबर 1800 2700 800 अथवा वेबसाइट sahajayoga.org.in  से प्राप्त कर सकते हैं।

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